Tuesday, 19 May 2020


बदला नहीं बदलाव
    पाँच तत्वों में अग्नि ज्जवलनशील तत्व है| भारतीय दर्शन शास्त्र में इस तत्व का प्रमुख स्थान है| कहा गया है कि मुख्य रूप से, अग्नि तीन प्रकार के होते हैं| पहला वो जिसे हम अक्सर आग कहते हैं, जो किसी भी चीज को जलाकर भस्म कर देने की क्षमता रखती है| जिसे मनुष्य अपने सहूलियत के अनुरूप उसे उपयोग में लाता रहा है| दूसरा जठराग्नि, जो पेट में उत्पन्न होती है, जिसे आम भाषा में हम भूख कहते हैं| तीसरा वो आग जो मनुष्य के मस्तिष्क के अंदर बीज-सा अप्रकटित रूप में उपस्थित होता है और परिस्थितियों के अनुरूप प्रकट होता रहता है| यह आग जलन, ईर्ष्या, बदला जैसी भावानाओं का प्रतीक है| ऐसी भावनाएँ सबसे पहले उसी जगह पर चोट करती है, जहाँ ये उत्पन्न होती हैं| अर्थात् व्यक्तिगत रूप से पहले उन पर ही असर होगा| वह अपना सुद-बुध, विवेक खो देगा और सही निर्णय लेने में असमर्थ हो जाएगा| 

     आध्यात्मिक क्षेत्र में भी अग्नि का अत्यंत महत्व है| साधकों का मानना है कि पाँच महातत्वों में, अग्नि तत्व से मनुष्य की जितनी शुद्धि होती है, उतनी अन्य तत्वों से नहीं होती| जहाँ अग्नि का सकारात्मक पक्ष मनुष्य के उद्देश्य पूर्ति का काम आता है तो नकारात्मक सोच सामर्थ्य को भी असमर्थ में परिवर्तित कर देता है|  जिस प्रकार एक चिंगारी दावालन बन समूचे जंगल को जला सकता है, उसी प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली एक गलत सोच स्वयं के साथ-साथ समूचे समाज को भी नुकसान पहुँचा सकता है| कभी-कभी मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन इस आग के चलते बर्बाद हो जाता है| महाभारत का दुर्योधन इस कथन का सटीक उदाहरण है| इस आग को यदि माचिस की तिली बनाकर, काबू में रखा जाए, तो बहुत ही लाभदायक सिद्ध हो सकता है| बदले की आग स्वयं को उत्थान की ओर ले जाना चाहिए न कि पतन की ओर| वास्तव में बदला लेना आसान नहीं होता| इसके लिए शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक रूप से बलवान से भी बलवान बनाना पड़ता है| रणनीति अपनानी पड़ती है| इतिहास गवाह है कि जिस प्रकार चाणक्य ने रणनीति अपनाकर, बिना कोई शस्त्र धारण किए, बल प्रदर्शित किए, घनानन्द को मात दिया था| उसी प्रकार योजना, संयम और निरंतर प्रयास से कोई भी कार्य सम्पन्न हो सकता है इसमें कोई विकल्प ही नहीं है| चाहे फिर वह बदला ही क्यों न हो|  सोना आग में तपकर ही खरा होता है| शारीरिक बल या अधिष्ठान का बल अशाश्वत होता है| इसलिए हम कह सकते हैं कि बदला लेना असंभव भी नहीं होता| किन्तु यह ध्यान में रखकर बदला लेना होता है कि सामाने खड़ा शत्रु कौन है? आपके संग कौन हैं? आपकी ताकत क्या है?  समय कितना है? फिर अपनी रणनीति द्वारा समस्या को इस प्रकार कुचलना चाहिए ताकि वह पुनः जीवन में अपना सर न उठा सके| ऐसी जीत, मनुष्य के जीवन में दुबारा जन्म लेने जैसा प्रतीत होता है| हमारे वेद, उपनिषद जैसे महान ग्रंथ भी यही कहना चाहते हैं कि हार में ही जीत छिपी होती है उसे समझो, स्वयं जीवन को आनंदमय बनाओ किसी और के आने का प्रतीक्षा मत करो|
-      प्रोफेसर नंदिनी    
     बहुत अच्छा लेख लिखा है| यकीन नहीं होता है कि नंदिनी ने लिखा है| बचपन में कैसी थी और अब कितनी सयानी हो गई है| अच्छा लग रहा है– “प्रोफेसर नंदिनी......!!” आलोक को लंदन से भारत आए हुए पंद्रह दिन हो गए| उसे पुरानी बहुत-सी बातें याद आने लगी| मैं पंद्रह साल का था और वो बारह साल की|  वो अपने माता-पिता की एक लौती थी पर मेरे ऊपर दो भैया| लड़का होने के नाते मेरी सोच में, बोलने के तरीके में खेलने-कूदने में, दोस्ती करने के तरीके में काफी अंतर था| वैसे भी मैं थोड़ा बदमाश था| ऐसा अब लगता है| तब कोई बोलता था, तो मैं मुँह तोड़ देता था|  खैर....       
     वैसे हर दो-तीन साल में आलोक एक बार भारत आता-जाता रहता था पर किसी को भनक नहीं लगती थी| इस बार आलोक ने अपने पुराने दोस्तों से, विशेष रूप से नंदिनी से भी मिलने का पक्का प्लान महीनों पहले बन चुका था| फेसबुक में दोस्ती कर ली पर फोन नंबर माँगने की हिम्मत नहीं हुई थी किन्तु भारत आने से पहले वाले दिन फेसबुक पे एक मेसेज छोड़ दिया कि मैं कल भारत के लिए रवाना हो रहा हूँ|  मेरा लंदन का नंबर चालू रहेगा|  मेरा नंबर +44 7911 123456 है|   
प्लान के मुताबिक भारत में उन सभी पुराने दोस्तों से मिलकर आलोक बहुत खुश हुआ| बहुतों के बाल सफेद हो गए, कुछ के तोंद निकल आए, कुछ के तो बच्चों की शादियाँ भी हो चुकी हैं| अब समय बदल चुका है| बचपन की तरह नहीं रहा| माता-पिता से झूठ बोल लेते थे किन्तु पत्नियों से कोई झूठ बोलकर कोई बच सकता है भला! यह ज्ञानोदय भी हो गया|  सभी दोस्त अपनी पत्नियों से अनुमति लेकर, अगले दिन ऑफिस में छुट्टी लेकर बरसों बाद शराब पीते हुए नाइट आऊट किया था| बचपन की सारी बातें चोरी-चोरी सिगरेट और शराब पीने, फस्ट लव लेटर, क्रिकेट मैच के दौरान हुए झगड़े, निक नेम रखने जैसी कई बातों को खूब याद किया और बरसों बाद ठहाका मार-मार कर जी भर कर सबने हँसा भी| 
     दोस्तों की बात अलग है पर अब वह जिससे मिलने वाला है, वह एक लड़की है| अरे लड़की क्या, अब वह भी औरत है| दो बच्चों की माँ है| बचपन में उंगली चूसती थी|  आलोक मज़ाक-मज़ाक में अचानक आकार हाथ खींच देता, तो पीछे पड़कर मारने लगती थी| वैसे वो किसी से न कुछ बोलती थी न ही लड़ती थी| पढ़ाई में भी मंद थी|  हमेशा उंगली मुँह में डाले एक कोने में बैठी रहती थी|  वह अपने मा-बाबूजी की लाड़ली बेटी थी| माँ कहती थी कि उनके शादी के करीब दस साल देर से पैदा हुई थी इसलिए उसे सर चढ़ाकर रखते थे| वह उनके आँखों की तारा थी| मैंने दो-एक बार छेड़ा था, लेकिन मैं वह बात मजाक समझकर भूल गया था| शायद वो नहीं भूली थी| मुझसे बदला लेने के लिए दस दिनों बाद, न जाने उसने मेरी माँ से क्या कहकर मेरी शिकायत कर दी थी...... शाम को जब मैं खेलकर घर आया तो मेरी माँ ने डंडे से मेरी पिटाई कर दी| पहली बार मेरी माँ से मेरी जबरदस्त बहस हो गई थी| मेरे पापा मेरे दोस्त समान थे| उनसे पता चला कि नंदिनी ने शिकायत की थी| पापा ने प्यार से पूछा कि मैंने उसे क्या किया?  मैंने रोते हुए कहा - मुझे नहीं पता|  पापा समझ गए कि मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ| उन्होंने कहा लड़कियाँ लड़कों जैसी नहीं होती बेटा| वो कोमल और संवेदनशील होती हैं| उनसे दूर रहा करो, अब तुम बड़े हो गए हो| मेरी माँ ने भी, दोस्ती के चलते, उस बात को नंदिनी के घर वालों को नहीं बताया| उसके बाद, पापा का तबादला हो गया और हम वहाँ से दूसरे शहर चले गए| करीबन दस-बारह वर्षों के बाद पुनः नंदिनी के माता-पिता से मेरे मुलाकात तब हुई जब मैं पच्चीस साल का हो गया और एम सई ए के बाद मैं लंदन जाने की तैयारी कर रहा था| पासपोर्ट के सिलसिले में बाहर गया हुआ था| वो मेरे घर आए हुए थे| उन्हें देखते ही मेरा बचपन, वह सरकारी घर, गलियाँ सब याद आने लगीं| मैंने झुककर दोनों के चरण स्पर्श किए और वहीं बैठ गया|  दस मिनट पश्चात् वो जाने को हुए| माँ ने उन्हें रुकने के लिए नहीं कहा| उन्होंने कहा कि हम केवल आलोक को देखना चाहते थे कि अब कैसा दिखाता है| हाथ जोड़कर कहा- अब इजाज़त दीजिए| पिताजी से पूछने पर पता चला कि वे दरअसल नंदिनी का रिश्ता लेकर आए थे और माँ ने यह कहकर टाल दिया कि “बुरा मत मानना दर असल हम ऐसी लड़की के लिए देख रहे हैं जो थोड़ा पढ़ी लिखी हो| कल को अपने बच्चों को पढ़ा सके| क्योंकि वो अभी लंदन जाने वाला है| ताल-मेल हर जगह से होनी चाहिए| वैसे भी आपकी एक ही बेटी है| दूर भेजने से अच्छा है कि वो आपके नज़रों के सामने रहे|” मैं कुछ न बोला| उनके लिए बुरा जरूर लगा था|  कुछ दिनों बाद मैं लंदन चला गया| फिर मेरी, शादी, बच्चे, नौकरी…… 35 साल बीत गए|  
     दस दिन हो गए किन्तु नंदिनी का मेसेज नहीं आया| आलोक को बुरा लगा पर दुबारा मेसेज नहीं किया| करीबन 15 दिनों के बाद जवाब आया| माफ करना मैं बिजी हो गई थी इसलिए मेसेज नहीं देख पाई| मेरा फोन नं। +91 1234 456789 है| आलोक को बहुत खुशी हुई और घबराहट भी| हिम्मत जुटाकर, शिष्टता के साथ उसने नंदिनी से बातें की| बचपन के दोस्त की आवाज़ सुनकर नंदिनी भी बहुत खुश हुई| एक जगह मिलने का निश्चय किया| आलोक को रात भर नींद नहीं आई| कितनी बदल गई है नंदिनी| मेरे पुराने सभी दोस्तों में, इसने सबसे अधिक डिग्रियाँ ली है| कितना ठहराव आ गया है| पढ़-लिखकर एक मुकाम बना लिया है| सुबह से दिल में एक बेचैनी थी| नाश्ता भी ठीक से नहीं कर पाया| 
     अगले दिन जब मिले तो नंदनी ने पहला सवाल किया- अपनी पत्नी और बच्चों को साथ क्यों नहीं लाए? आलोक ने कहा कि- लंदन से 2-3 साल में एक बार भारत आते हैं| मैं अपने माता-पिता को देखना चाहता हूँ और वो अपनी| यहाँ एक हफ्ता भर थी अब वो अपने माँ के यहाँ गई है| 15-20 दिनों में मैं खुद वहाँ जाकर सास-ससुर जी से मिलूँगा और फिर वापस लंदन| अरे शुक्र मान मैं तुझे देखने लंदन से आया हूँ तू कब आएगी लंदन मुझे देखने?
मेरे बच्चे अमरीका में हैं| वहाँ गई थी एक-दो बार, वया लंदन, तब याद आता था कि तुम यहीं पर रहते हो| वैसे भी देर इज़ नो टाइम यू नो|  यूनिवर्सिटी, स्कॉलर्स, सेमीनर्स, बुक्स पब्लिशिंग एक्सएट्रा-एक्सएट्रा...... अब लंदन के लिए कहाँ से टाइम लाऊँ बोलो? चौबीस घंटे कम पड़ते हैं मुझे| तुम ही मिल लिया करो जब भी भारत आओ|  इस बार पूरे परिवार के साथ आना|  मुझे अच्छा लगेगा| उम्मीद है कि आपकी माँ अच्छी हैं| मैंने सुना कि तुम्हारे पिताजी नहीं रहे| वो बहुत अच्छे इंसान थे| मुझे हमेशा प्यार से बातें करते थे|   
     मुझे भी सुनकर दुख हुआ कि तुम्हारे माता-पिता भी नहीं रहे| माँ ठीक-ठाक ही है| चाय पीते हुए, मुसकुराते हुए आलोक ने कहा– मैं एक व्यक्तिगत प्रश्न पूछूँगा बुरा तो नहीं मानोगी? नंदिनी की नजरें सीधे आलोक की नज़रों से मिली| नंदिनी ने चाय कप को ओठों से लगाते हुए पूछने का इशारा किया| हिचकिचाते हुए आलोक ने पूछा – तुमने इतना कैसे और कब पढ़ लिया? नंदिनी का चहरा गंभीर हो गया| उसके माता-पिता का चहरा उसके सामाने आ गया| वह आलोक की माँ के बारे में कुछ न बोली|  मुस्कुराकर फिर से चाय पीने लगी| आलोक ने कहा – देअर ईस नौ कंपलशन...... लीव इट| ऐवाज़ जस्ट...... यू नो......|  अमेरिका के किस स्टेट में तुम्हारे बच्चे हैं? आलोक ने बात बदल दी| नंदिनी ने कहा नो.. नो.. लेट मी गिव द आँसर...... इट्स आलराइट| एक्चुअल्ली ये किसी के चुनौती का जवाब है| मेरे पति एक साधारण सरकारी नौकरी करते हैं किन्तु शादी के बाद जब मैंने पढ़ने की बात की, उन्होंने मना नहीं किया| हर तरह से मेरा साथ दिया| वे जानते थे कि मेरे माता-पिता को मेरे पीछे देखने वाला कोई नहीं| इसलिए उन्होंने उन्हे अंतिम समय में अपने पास ही बुलावा लिया|  कहा- सामाने रहेंगे तो हमें चिंता नहीं होगी|  हम भी अपना काम निश्चिंत रूप से कर पाएँगे|  उन्होंने अपने माता-पिता की तरह सेवा की|  मैंने भी उन्हें मायूस नहीं किया| दर्शनशास्त्र की डिग्री लेकर जब मैं यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बनी, मारे खुशी के मेरे पिता बच्चों की तरह खुशी से फूट-फूट कर रोए और कहा अब मुझे डर नहीं| मैं चैन से मर पाऊँगा| मैं पहली बार उन्हें रोते तब देखा था, जब वे बत्तीस वर्ष पहले, तेरे घर से वापस लौटे थे| आलोक को असुविधा महसूस हुई चाय कप टेबल पर रखते कहा– आई याम रिएलि सॉरी फॉर व्हाट हेड हेपनण्ड| नऊ आई आस्क एन अपालजी ऑन बी हाफ मई मदर ऑल्सो.......सॉरी...... सॉरी। कहते-कहते उसके आँखों में आँसू आ गए| तब आलोक को अपने पिता की बात याद आ गई| “लड़कियाँ बहुत कोमल और संवेदनशीसल होती हैं|” झट से नंदिनी अपनी जगह से उठी और टिशू पेपर देते हुए बोली- मेरा मतलब तुझे दुख पहुंचाना नहीं था आलोक ...... सॉरी-सॉरी| आलोक भी मुस्कुरा दिया और कहा- अभी मुझसे बदला लेने के लिए तो नहीं बुलाया है न?  किसी से पिटवाओगी या फिर किसी को सुपारी-उपारी तो नहीं दिया है न......  
नो......नो...... नाट एट आल यार|  मैं गुस्सा नहीं हूँ|  इन्फैक्ट दट डे मेड मी टुडे|  मुझे पहले गुस्सा तो आया था पर मैंने एक चुनौती की तरह स्वीकार किया|  मेरे माता-पिता ने मेरा साथ दिया|  स्वावलंबी बनाया|  मेरे पास भी खुद को साबित करने का यह एक ही तरीका था|  यदि मैं तुम पर गुस्सा होती तो क्या मैं मिलने आती?  हम बचपन के दोस्त हैं|  बचपन के दोस्त बहुत कीमती होते हैं|  वी आर अलवेज फ़्रेंड्स...... हैं न? कहती हुई नंदिनी ने अपना हाथ बढ़ाया|  यस इन्डीड ...... कहते हुए आलोक ने उसे अपने गले से लगा लिया| मैं लंदन जाने से पहले तुम्हारे पति से जरूर मिलकर जाऊँगा कहते-कहते गला रुँध गया|  आलोक के आँखों में फिर एक बार आँसू आ गए| 
जयहिन्द 
शारदा 



Friday, 23 October 2015

लेख




हिन्दी का वैश्विक संदर्भ

वैश्विक धरातल पर हिन्दी सिनेमा दशा एवं दिशा
   
          सिनेमा मनोरंजन जगत का उत्कृष्ट साधन है।  पहले सिनेमा समाज में सीमित लोग ही देख पाते थे।  शहरों में रहने वाले लोग सिनेमाघर जाकर बड़े पर्दे पर सिनेमा देखते थे और उनका सम्पूर्ण आनंद ले पाते थे।  किन्तु टेलीविज़न का चमत्कारी आविष्कार ने उन्हीं सिनेमाओं को, छोटे रूप में घर-घर पहुँचाया।  वर्तमान समय में टेलीविज़न एक ऐसा साधन बन गया है, जिसके द्वारा मनोरंजन की कल्पना न के समान है।  बड़े पर्दे पर सिनेमा देखने की अवस्था होने पर भी प्रत्येक वर्ग के लोग अपने घरों में टेलीविज़न भी रखते हैं और उसका लाभ भी उठाते हैं। 
          भारत देश में सर्वप्रथम 1913 में बनाई गई 'आलमआरा', 'सत्यहरिश्चंद्र' सिनेमाएँ वैश्विक धरातल पर केवल मानवमूल्यों के संदर्भ में ही लिया जा सकता है।  किन्तु यह केवल एक प्रयोगात्मक प्रक्रिया थी।  हिन्दी भाषा के मूल्यांकन के रूप में नहीं।  इसका प्रदर्शित समय भी कम होता था।  क्योंकि उक्त सिनेमाएँ मूक सिनेमाएँ थी।  जिनमें केवल अभिनय किया जाता थास्थिति, संदर्भ और विषय स्लाइड पर लिखावट के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता था। स्वतन्त्रता के उपरांत आईं कुछ सिनेमाओं को वैश्विक धरातल पर अवश्य लिया जा सकता है।  40 से 60 दशक तक जो सिनेमाएँ बनतीं थीं, वे सामाजिक एवं भारतीय जीवन शैली से ओतप्रोत हुआ करतीं थीं।  कालांतर में विभिन्न प्रकार की सिनेमाएँ जैसे – सामाजिक, व्यक्तिगत, मनोवैज्ञानिक, सत्यकथाएँ, तिलिस्मी, रहस्यात्मक, भयानक, आपराधिक, पारिवारिक आदि आईं।   इनके अलावा शनैः-शनैः सिनेमाओं में असामाजिक तत्व भी जुड़ते चले गए।   जिनका प्रभाव हिन्दी भाषा पर भी पड़ा।   
          रंगमंच पर खेले जाने वाले नाटकों की भाषाई एवं व्यावहारिक गरिमा सर्वदा होती थी और उसे जारी रखने का प्रयत्न भी किया जाता है।  आरंभ में बने भारतीय फिल्मों में भी इस प्रकार की गरिमा बनाए रखने का प्रयत्न किया जाता था।  किन्तु फिर भी नाटक की तुलना में फिल्मों में अभिनय किंचित भिन्न होता है।  यह अंश अत्यंत विस्तृत और उक्त विषय से परे है।  इसलिए ऐसे तथ्यों पर प्रकाश डालना अनावश्यक है।   उच्च विचार सर्वदा भाषा के उच्च स्वरूप को प्रतिबिम्बित करता है।  उदाहरण के लिए पूरब और पश्चिम सिनेमा में यही छवि दृष्टिगोचर होती है।  इस सिनेमा में भारत नामक युवक विदेश जाता है।  वहाँ शर्मा जी की बेटी प्रीति उससे विवाह करना चाहती है।  किन्तु बचपन से विदेश में पली-बड़ी होने के कारण वह भारतीय संस्कृति को न वह जानती है, मानती है, और न ही अपनाना चाहती है।  शर्मा जी चाहते हैं कि उनकी बेटी भारत से विवाह कर हिंदुस्तान में बस जाए।  भारत प्रीति से प्रस्ताव रखता है कि, विवाह से पहले एक बार वह उसके साथ हिंदुस्तान आए।  प्रीति केवल एक बार जाने के लिए राजी हो जाती है।  प्रीति के पिता शर्मा जी डरते हैं कि अगर प्रीति को हिंदुस्तान पसंद नहीं आएगा तो भारत को भी उन्हीं की तरह विदेश में बिना इच्छा के रहना पड़ेगा।  वह चिंतित हो जाता है और भारत से इसकी चर्चा करता है।  यथा –
शर्मा      : भारत ये क्या वचन दे दिया तुमने?  बेटे!  हिम्मत हार गए हो या मजबूरी के सामने सर झुका दिए?
भारत     : नहीं ये बात नहीं है
शर्मा      : तो फिर ये वचन क्यों दे दिया तुमने...? तुम वापस आओगे?  यहाँ बस जाओगे?
भारत     : अगर प्रीति वापस आए तो
शर्मा      : बेटे ! जो तुम सोच रहे हो अगर वो नहीं हुआ तो?
भारत     : वचन दिया है वापस आऊँगा।  मगर नहीं चाचाजी ऐसा नहीं होगा।  अपने यहाँ जो मिट्टी की खुशबू है न वो तो अजनबी के साँसों में भी संस्कार भर देती है, ये मेरा विश्वास है। 
          उक्त संवाद में एक भारतीय युवक का देश प्रेम और बेटी के पिता का छटपटाहट दृष्टिगोचर होता है।  यह सेनेमा विषय के अतिरिक्त गाने के बोल, अभिनय और संवादों के लिए प्रसिद्ध है।  जिसकी भावनाओं को वर्तमान युवा पीढ़ी भी अनुभव करती है।  अचेतन और अवचेतन अवस्था में छिपी हुई भावनाएँ इस प्रकार के सिनेमा से बहिर्गत होते हैं।  इसी प्रसंग को हालही में आए सिनेमा नमस्ते लंदन सिनेमा में, अर्थात् सैंतीस वर्ष के उपरांत पुनः पूरब-पश्चिम सिनेमा के विषय पर निकाली गई सिनेमा में, दबंग रूप से संवादों की प्रस्तुति की गई।  भाषाई रूप से तुलना किया जाय तो हमें यह विदित होता है कि 'पूरब और पश्चिम' की तुलना में  नमस्ते लंदन सिनेमा की भाषा हल्की, व्यंग्य, मिश्रित और सरल है।  वर्तमान सिनेमाओं में भाषाई गरिमा से भी भावनाओं की प्रस्तुतीकरण को अधिक महत्व दिया जा रहा है।  यथा –
अर्जुन    : (जसमीत की ओर देखते हुए) उसके परदादा ने कुछ और इंडिया देखा है।  असल इंडिया की सैर करवाते हैं उसको....... 5000 साल पुरानी सभ्यता के वजह से हम सबको ऐसे ही झुकके प्रणाम करते हैं।  ऐसी सभ्यता जिसमें कैथलिक प्रधानमंत्री कुर्सी एक सिख के लिए छोड़ देती है और एक सिख प्रधानमंत्री पद की शपथ एक मुस्लिम राष्ट्रपति से लेता है।  उस देश की बागडोर संभालने के लिए जिसमें 80 प्रतिशत के लोग हिन्दू हैं।  आपकी मातृभाषा अंग्रेजी पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा हमारे ही देश में घिसी जाती है।  और आपको शायद यह भी नहीं पता कि अंग्रेजी के ज़्यादातर शब्द संस्कृत से लिए गए हैं।  संस्कृत का शब्द मातृ मदर, भातृ बना ब्रदर, ज्यामेति बनी ज्यामेंट्री और त्रिकोण्मेत्रि बनी  ट्रिगनोमेट्री।  आपको शायद यह बात दिलचस्प लगेगी कि हमारे यहाँ 21 भाषाओं में 5600 अख़बार और 3500 मैगजीन छ्पती हैं, जिसे पढ़ने वालों की संख्या 12 करोड़, जो आपके देश के मुक़ाबले कई ज्यादा हैं।  चाँद तक पहुँच गए हम पर तब भी आप लोगों को हम हिंदुस्तानियों के हाथ में सिर्फ सांप की बीन ही नज़र आती है।  डॉक्टर्स, इंजीनीयर्स और साईं टिस्ट की गिनती में जनाब हम सिर्फ दो मुल्कों से पीछे हैं।  ये थी दिमाक की बात।  अब करते हैं ताकत की बात।  दुनिया में सबसे पहली फौज हमारी है।  आपके आगे फिर भी झुक के प्रणाम करता हूँ क्योंकि हम किसी को अपने से छोटा या कमजोर नहीं समझते।  नमस्कार!!
          इस प्रकार नमस्ते लंडन सिनेमा के माध्यम से यह भी दर्शाने का प्रयास किया गया है कि वर्तमान भारत प्रत्येक क्षेत्र में वैश्विक धरातल पर अन्य देशों के प्रत्याशी के रूप में खड़ा है।  हर सतह पर समर्थता का परिचय देता रहा है।  स्वतन्त्रता का 69 वाँ वर्षगांठ मनाता भारत का मनोबल आज बहुत दृढ़ है।  नमस्ते लंदन एवं पूरब-पश्चिमसिनेमाएँ भारत का गौरवपूर्ण पहलू का प्रस्तुतीकरण है।   किन्तु भाषा में हिंदीतर शब्द अधिक और भाषा का स्तर फिसलता दृष्टिगोचर होता है।
          वर्तमान सिनेमाओं में तकनीकी एवं दृश्यात्मकता को अधिक महत्व दिया जा रहा है।  तकनीकी और वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर वैश्विक धरातल पर मूल्यांकन या तुलना किया जा रहा है।  हलही में बनी फिल्में जैसे – बाहुबली’, क्रिश’, मक्खी’, लाइफ ऑफ पै आदि उक्त तथ्य के अच्छे उदाहरण हैं।  ऐसी सिनेमाएँ असहज और अवास्तविक होते हैं।  मानवेतर शक्तियों द्वारा असंभव कार्य करने में सक्षम होने वाले मनुष्यों की भाषा तकनीकी या यान्त्रिकी होती है।  कुछ शब्द तो केवल उस पात्र के लिए ही सृजित की गई होती है जिसका शब्दकोश में अर्थ नहीं मिलता।  हॉलीवुड के फिल्मों में भी ऐसी फिल्में यदाकदा बनती ही रहती हैं।  जैसे – अवतार’, एलियन’, हैरीपॉटर की कहानियाँ ’, पायरेट्स ऑफ केलीबीन के सभी भाग जैसी फिल्में अवास्तविक होते हुए भी अपनी दृश्यात्मकता के कारण रोमांचित बन पड़े हैं।  इनमें भी भाषा की गरिमा का कोई महत्व नहीं होता।  मात्र सम्प्रेषण करना होता है।
          कुछ सिनेमाएँ राष्ट्रीय धरातल पर बहुत सफल होती हैं, किन्तु वैश्विक धरातल पर अपनी जगह नहीं बना पाती क्योंकि उनमें निहित संकल्पना विदेशी प्रेक्षकों को रंजित नहीं कर पातीं।  मुहावरों और कहावतों की भाषा हिंदीतर प्रांत के लोगों को कठिनाइयों में डाल देती है।  जैसे – "घर में जवान बेटी सीने पे पत्थर की सील की तरह होती है, हमारे जाने बिना यहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता" आदि।  कुछ फिल्मों को समझने हेतु प्रेक्षक को उस परिवेश की सभ्यता, संस्कृति, रहन-सहन, जाती-पाती, ऊँच-नीच, परंपरा और मानसिकता जैसे कई पहलुओं का जानकारी होना अवश्यंभावी हो जाता है अन्यथा संवाद की गंभीरता, भाषा का घुमाव, वाक्यांश एवं अभिव्यक्ति नहीं समझ पाते हैं।  ऐसी फिल्म से उन्हें रसानंद प्राप्त नहीं होता।  यथा –
स्वदेश सिनेमा में मोहन भार्गव नामक एक भारतीय नौजवान, जो नासा में वैज्ञानिक है, भारत आता है और अपने देश की दयनीय स्थिति को देखकर बहुत दुखी होता है।  वहाँ कुछ दिन रहने के उपरांत उसे वहाँ की जनता से लगाव हो जाता है।  वह गाँव में बदलाव लाना चाहता है।  गाँव के गरीब बच्चों को शिक्षित कराना चाहता है किन्तु गाँव के पंचों की भी अपनी जिद होती है।  यथा –
" पंच     : जो कभी नहीं जाती, उसी को जाती कहते हैं। 
मोहन    : जो सदियों से आ रही है, तो जरूरी नहीं है कि वह सही है।  मैं सिर्फ वही कह रहा हूँ जो आप लोगों के बीच कुछ दिन रहकर मैंने महसूस किया है।  देखा वो ये कि हम लोग सिर्फ आपस में लड़ते रहते हैं।  जबकि हमें लड़ना चाहिए अशिक्षा के लिए।  बढ़ती आबादी भ्रष्टाचार के खिलाफ।  हममें से हर कोई हर रोज गलियों में सड़कों पे कहीं न कहीं ये कहता रहता है कि इस देश का कुछ नहीं होने वाला।  यह देश बरबादी की ओर बढ़ रहा है।  हम सिर्फ यही कहते रहें तो सचमुच यह देश एक दिन बर्बाद हो जाएगा।  उसके लिए आपको कुछ करना होगा, आपको भी।  सिर्फ पंचों को नहीं।  आप सब गाँव वालों को आप अपनी समस्याओं के लिए इन पंचों को दोषी ठहरा रहें हैं लेकिन उनकी जगह पर आकार आप भी वही करेंगे।  और यह बात मुझ पर भी लागू होती है।  दलित ब्राह्मण को दोष देते हैं।  ब्राह्मण कहते हैं कि दलित उनकी जाती का भ्रष्ट कर रहें हैं।  लुहार और कुम्हार लाला के कर्ज को दोष देते हैं।  जमींदार किसान को दोष देते हैं लेकिन उसका हक नहीं देते हैं तो हम महान कैसे हो गए?  गाँव में दिक्कतें हैं तो हम सरकार की ओर उंगली उठाते हैं।  वो किसी और की ओर उंगली उठाते हैं।  हम सब किसी और को दोष दे रहें हैं जबकि सच्चाई यह है कि हम सभी दोषी हैं क्योंकि समस्या हम खुद ही हैं।  मैं, आप हम सब....
             मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि एक व्यक्ति जुलाहा जिसने खेती-बाड़ी करनी चाही, वह अपने परिवार को दो वक्त की रोटी नहीं दे सकता।  वह अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दे सकता।  जो भूख से मरता देख सकता है....."
          इस प्रकार गंभीर समस्या का चर्चा या संवाद हो रहा हो तो गैर-भारतीय जिन्हें जमींदारी पद्धति, गाँव का परिवेश, परंपरा, जलवायु संबंधी जैसे तथ्यों की जानकारी नहीं होती, उन्हें इस प्रकार की फिल्में बोरियत उत्पन्न करती है।  फिर भी कुछ फिल्में, वैश्विक स्तर महत्वपूर्ण होते हैं, जिन्हें प्रांतीय भाषाओं में अनुवादित कर देते हैं या फिर अनुवादित कथोपकथन तत्काल पटल पर प्रस्तुत हो रहा होता है।  वर्ष 2004 मैं बनी स्वदेश राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित थी किन्तु अन्य व्यावसायिक फिल्मों की तरह व्यापार कर पायी यह कहना कठिन है।   
         

पिछले दो दशकों में, विदेशी बाल कार्टून सिनेमाएँ जैसे – लाईन किंग (1,2), मेडागास्कर (1,2,3), नीमो’, टिनटिन’, ब्रेव’, कुम्फू पांडा (1,2), कार्स’, प्लेन्स आदि।  बहुत प्रचलित हुईं और वैश्विक धरातल पर एक विशेष जगह बनाई।  इनके अलावा हॉलीवुड में ऐसे मानवेतर शक्तिशाली पात्र ही-मैन’, बैट-मैन’, स्पाइडर-मैन’, सुपर-मैन’, आइरन-मैन आदि, जो अच्छे और गरीबों की मदद करते हैं, को प्रांतीय भाषाओं में अनुवदित कर प्रस्तुत की जाती है।  जिनकी भाषा सर्वदा हल्की ही होती है।  अंग्रेजी के कई शब्द ज्यों का त्यों प्रयोग कर दिया जाता है।  उक्त सभी बच्चों की फिल्में वैश्विक धरातल पर अपना विशेष स्थान बनाएँ हैं।  संसार के सभी बच्चे इन पत्रों से परिचित हैं।  टेलीविज़न के क्षेत्र में भी कुछ पात्र जैसे टॉम और जेरी’, डोरेमोन
, बग्स-बनी’, मिकी-माऊस’, एंग्री-बर्ड्स आदि हिन्दी में या भारत के अन्य प्रांतीय भाषाओं में भी वार्तालाप करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं।  इस प्रकार सिनेमा और दूरदर्शन का मंच वैश्विक धरातल पर हिन्दी तथा उक्त तथ्यों को पुष्टि करती है।  विशेष रूप से बाल कथाओं का मंच पूरे विश्व का सार्वजनिक मंच बन चुका है। 

          तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में विकास होने के उपरांत हॉलीवुड के द्वारा सृजित कुछ अद्भुत और अवास्तविक दृश्य एवं पात्र (अवतार) इतने प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किए गए हैं कि उनके दृश्य वास्तविक लगते हैं।  इस प्रकार का प्रयोग अब हिन्दी फिल्मों में भी (रोबो) यादकदा दृष्टिगोचर होने लगे हैं।  गाँव और छोटे शहरी उन सिनेमाओं से आनंद प्राप्त करते हैं।  किन्तु महानगरीय वासी मूल सेनेमा को ही देखने में इच्छुक होते हैं।  ये लोग फिल्मों की तुलना और मूल्यांकन करने में सक्षम होते हैं।  इसलिए ऐसे दर्शकों को फिल्मों की कसौटी के रूप में मान सकते हैं।  
        
  80-90 के दशक में भारत की कुछ फिल्मों में संवाद शैली अत्यंत मनोरंजक एवं प्रभावशाली थे, जिसके कारण कुछ हिन्दी फिल्में सुपर हिट हुईं  और सदाबहार बनकर रह गईं।  ऐसी सिनेमाओं को केवल हिन्दी प्रांत के लोग ही नहीं बल्कि हिंदीतर प्रांत और विदेशों में अब स्मरण करते हैं और उन्हें बारंबार देखते हैं।  यथा –
शरम यहाँ का सबसे अनमोल गहना है” (पूरब और पश्चिम, 1970)
जो डर गया , समझो मर गया” (शोले, 1975)
डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है” (डॉन, 1978)
जाओ उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे हाथ पर ये लिख दिया था... उसके बाद..... उसके बाद भाई तुम जिस कागज़ पे कहोगे, मैं उस पर साइन कर दूंगा” (दीवार, 1979)
मैं आज भी फेके हुए पैसे नहीं उठाता (दीवार, 1979)
हम भी वो हैं, जो कभी किसी के पीछे नहीं खड़े होते हैं।  जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है” (कालिया, 1981)
आई केन वाक इंग्लिस, आई केन लॉफ इंग्लिस बिकाज इंग्लिस ईस ए फन्नी लैंगवेज़” (नमक हलाल, 1982)
मोगेम्बो खुश हुआ” (मिस्टर इंडिया, 1987) आदि।
कोई बात नहीं सेनोरीटा कोई बात नहीं बड़े-बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहतीं हैं। (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे, 1995)
         उक्त सिनेमाओं के अलावा कुछ अत्यंत मनोरंजक सिनेमाएँ ऐसी भी हैं, जिनमें उद्देश्य की जगह अभिनय को महत्त्व दी गई।  चीनी कम’, लांच बाक्स’,
निशब्द’, पीके’, जो सामान्य मानवीय प्रवृत्तियों का ही प्रस्तुतीकारण है।  प्रेक्षकों में थोड़ा-सा कुतूहल उत्पन्न कर ढाई से तीन घंटों तक बांधकर रखने वाले उत्तम सिनेमा के दायरे में रखा जा सकता है।  इनमें निशब्द का विषय अनूठा था।  यह फिल्म साहसिक एवं निर्भीक अभिनय के लिए वैश्विक धरातल पर एक प्रयोग माना जा सकता है।  उसी प्रकार पीकू’, एक बुजुर्ग की कब्ज की बीमारी को आधार बनाकर हास्य-व्यंग्य के रूप में परोसा गया।  समकालीन व्यवस्था तंत्र, तर्क-वितर्क ही दर्शकों को बाँधें रखने में सफल रहा। 
         निष्कर्ष रूप से यह कह सकते हैं कि वर्तमान सिनेमा वैश्विक धरातल पर अवश्य सफल हुई है किन्तु भाषाई स्तर के कसौटी में सफल नहीं हो पा रही है।  यह भी झूठ नहीं है कि सिनेमाओं के द्वारा हिन्दी की जो प्रचार प्रसार हुई है, शायद ही किसी और माध्यम से हुई होगी।  हिंदीतर प्रान्तों में हिन्दी स्टाइल या फैशन के लिए भी सीखते हैं।  टूटी-फूटी हिन्दी ही सही किन्तु बहुत प्रेम से सीखते हैं और उनका प्रयोग करते हैं।  सभी को विदित है कि सिनेमाएँ केवल व्यापार हो गईं हैं।  समाज और समाजोद्धार का कर्तव्य के बारें में सोचेंगे तो वही बात हो जाएगी कि "घोडा घास से दोस्ती कर लेगा तो खाएगा क्या"।  बुद्धजीवी सिनेमाएँ देखने सिनेमाघर नहीं जाते क्योंकि वे ही समझते हैं कि वे समाज के उत्तरदायी हैं।  समाज का संस्करण उनके साहित्य और व्यक्तित्व से है।  अगर वे मनोरंजन के लिए सिनेमाएँ देखते भी हैं, तो वो, जो भाषाई रूप से और भावनाओं में उच्च हैं।   इसलिए वे आज भी पुरानी फिल्में ही देखना पसंद करते हैं। 
जयहिंद
 जयहिंदी 

नई उड़ान : मैं दहलीज हूँ .......मैंबचपन में हूँ यौवन में भी...

नई उड़ान :
मैं दहलीज हूँ .......
मैंबचपन में हूँ यौवन में भी...
: मैं दहलीज हूँ ....... मैं बचपन में हूँ यौवन में भी अधेड़ उम्र में , और जरा में मैं सुख में हूँ और दुख में भी कल्पना में और स...

Wednesday, 26 August 2015

मैं दहलीज हूँ .....


मैं दहलीज हूँ .......

मैं बचपन में हूँ यौवन में भी
अधेड़ उम्र में, और जरा में
मैं सुख में हूँ और दुख में भी
कल्पना में और सत्य में भी
                                                               मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ
मैं राग में भी विराग में भी
मूल्यवान भी मूल्यहीन भी
हूँ मैं मुक्त और अधीन भी
जीवन में भी मृत्यु में भी
                                                                मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ
हूँ मैं मिहिर के तेज किरण में
और रजनीश की शीतलता में
हूँ मैं दुल्हन सी छटा बहार में
और विधवा सी सूखी डाली में
                                                            मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ
मैं शत्रु भी हूँ और मित्र भी
स्मृति में हूँ और विस्मृति में
हूँ सफल में और विफल में
हूँ भक्ति में और श्रद्धा में
                                                        मैं इनके मध्य बसी दहलीज़ हूँ
भौतिक सुखों से मैं हूँ तटस्थ
किन्तु जिजीविषा से हूँ अनुरक्त
मैं शोर भी और सन्नाटा भी
मैं कभी प्रश्न तो कहीं उत्तर भी
                                                    मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ
मैं व्यक्त भी हूँ और गुप्त भी
संगीत के सप्त सुरों में हूँ
हूँ इंद्रधनुषी मुझ में सब रंग
कभी अंधकार और तिमिर तम
                                               मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ
मैं आर-पार दोनों छोरों में
देव व दैत्य के मध्य में भी
मैं हर मनुज के विवेक में हूँ
मैं सब में हूँ और सब सा हूँ
                                             मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ

जयहिन्द 

शारदा 



Saturday, 27 June 2015

तिथि गई तेल लेने (लघुकथा)

तिथि गई तेल लेने

         

 

    चरण अपने आँगन के एक छोर से दूसरे छोर तक चलते हुए बहुत ही तनावग्रस्त नज़र आ रहा था। बार-बार किसी को फोन करने का प्रयत्न कर रहा था। उसका सिर झुका हुआ एवं उसकी नज़र ऐसे ज़मीन को, एक टूक देख रहा थी जैसे अभी वहाँ से कोई जहरीली साँप या बिच्छू निकलेगा।  लगभग पंद्रह मिनट के बाद वह वहीं आम के पेड़ के नीचे बैठ गया।  घर के काम में व्यस्त होती हुई भी उसकी माँ की नज़र उस पर टिकी थी। बीच-बीच में उसे देख रही थी।  उसे समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे धीरज बँधाए। कैसे उसकी चित्त शांत कराए।
        आधे घंटे के बाद भी उसे वहीं अकेला टहलता दिखा तो उसे बहुत दुख हुआ और सोचा- हो न हो यह सब मेरा ही किया धारा है। लेकिन मैं क्या कर सकती थी?  इसमें मेरी क्या गलती है?  मैंने उसका भला करना चाहा था। जो भी होता है ईश्वर की मर्जी से होता है। मेरा क्या है मैं निमित्त हूँ और मैंने अपना धर्म निभाया। वह चरण के पास गई और धीरे से कंधे पर हाथ रखकर बोली- “मुझे माफ कर देना चरणऐसा कुछ हो जाएगा मैंने सोचा न था। सोचा था, मैं तेरी मदद कर रहीं हूँ। तेरा भला-बुरा मैं नहीं सोचूँगी तो और कौन सोचेगा बोल? चल अंदर......  चल मामा के साथ बातें करोगे तो सब अच्छा हो जाएगा। वो दो दिन यहाँ बिताने आया है फिर हैदराबाद चला जाएगा। ऐसा करो कि आज़ दोनों फिल्म देखने चले जाओ। बाहर कहीं अपनी मन पसंद का खाना भए खा लेना! कल रात भी तुमने ठीक से नहीं खाया था और इन बातों से मन भी हट जाएगा। ठीक है न?” माँ की बातें सुनकर उसने कहा-“आज़ इंडिया-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच है हमें कहीं नहीं जाना है।” अपनी घड़ी देखते हुए- “वैसे टाइम क्या हुआ है, चलो अभी दस मिनट में शुरू हो जाएगा। मामा क्या कर रहें हैं?” बात पलटते हुए माँ से कहा- “देख माँ जो होना था सो हो गया। मैंने आपको कुछ बोला क्या? नहीं ना.....अब जो आगे होगावह देखा जाएगा।  देखते हैं क्या करना है।  ज्यादा से ज्यादा क्या होगाजो सोचा था नहीं होगा। जान थोड़ी न नहीं चली जाएगी।  चलो। कितना सोचती हो। एक ही बात को पकड़कर इतना मत खींचो। चलो..... कोई बात नहीं मैं फिर से कोशिश कर लूँगा। और भी कई रास्तें हैं..... ठीक है न...अब चलो भारत-पाकिस्तान का वर्ल्ड कप देखते हैं.......” सॉरी चरण अगली बार मैं इस बात का ध्यान रखूँगी-माँ ने मायूस होकर कहा। दोपहर का भोजन अच्छे से खाऊँगा।  कल का कसर भी निकाल दूंगा ठीक है न .....!  अगली बार मैं भी ध्यान रखूँगा। छोड़ दो उस बात को..... चलो अंदर.....
    बैंगलुरु में इंजिनियरिंग पास करने के तुरंत बाद ही, किसी दोस्त के कहने पर, चरण ने एक्सपरिमेंट के तौर पे, पूने के एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी के लिए आवेदनपत्र भेज दिया। उसे उम्मीद थी कि उसे वह नौकरी आने से रही क्योंकि उन्हें कम-से-कम पाँच से दस साल के अनुभवी लोगों की जरूरत थी। चरण ने यह सोचकर आवेदनपत्र भेजा था कि कम से कम उसे यह ज्ञात हो जाएगा कि कंपनियों में इंटरव्यू कैसे लेते हैं, कैसे सवाल पूछते हैं वगैरह-वगैरह। इंटरव्यू की झलक से एक अवधारणा मिल जाएगी।  अच्छी प्रैक्टिस से दूसरे इंटरव्यूज अच्छे से दे पाएगा। कंपनी के लिखित परीक्षा में चयनित हो गया। अगले दिन इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। जाते ही कंपनी वालों ने पकड़ लिया कि अनुभवी नहीं है। उन्होंने वही पूछा- जब हमने अनुभवी लोगों के लिए इंटरव्यू रखा है तो आपने कैसे आवेदनपत्र भेज दिया? प्रश्न सुनते ही उसे विदित हो गया कि इस राउन्ड में पास होने से रहा। झूठ बोलेगा तो पकड़ा जाएगा। उसके प्रमाणपत्र ही प्रमाणित करते हैं कि यह अभी-अभी पास हुआ है। उसने सच कह दिया कि वह अनुभावी नहीं है। उन्होंने कहा कि अब अनुभवी नहीं हो तो क्या पूछें?  इतने में दूसरे व्यक्ति ने कहा- परीक्षा में तो अव्वल आए हो, ओके यू टेल मी अबाउट यूरसेल्फ़.....। चरण को यह प्रश्न अच्छा लगा। उसने जवाब खुद से शुरू किया था लेकिन जब पढ़ाई, प्रोजेक्ट आदि की बात आई वह अपने विषय के बारे में बताना शुरू कर दिया जिससे वहाँ बैठे जो इंटरव्यू ले रहे थे, उन्होंने विषय पर एक-एक कर प्रश्न करने लगे और वह बताता चल गया। इंटरव्यू के बाद जब वह बाहर आया, वह बहुत खुश हुआ।  सोचा इंटरव्यू तो बहुत आसान था। लोगों ने खमखाँ डरा दिया। बस केवल एक्सपीयरेन्स सर्टिफिकेट होता ना तो नौकरी मेरी पक्की थी। सोचा चलो यह तसल्ली रहेगी कि मैंने अपनी ओर से अच्छा किया। उन्होंने कहा कि इंटरव्यू का नतीजा दो दिनों में आपके मेल में मेसेज कर दिया जाएगा। थैंक्यू बोलकर बाहर आने के बाद उसे याद आया कि किसी काम के सिलसिले में मामा हैदराबाद से आने वाले थे, घर पहुँचगए होंगे। घर पहुंचते ही मामा ने पूछा इंटरव्यू कैसे किया तुमने? चरण ने सारी रामायण सुना दी। अब बस मेल का इंतज़ार करना है। अगली सुबह उठते ही उसने मेल देखा- मार्च सत्रह तारीख के दिन, सुबह दस बजे, कंपनी में रिपोर्ट करना है।उसके मामा बाहर किसी काम के सिलसिले में जाने के लिए जूते पहन रहे थे चरण की बातें सुनकर कहा- सोचना क्या है जिसकी उम्मीद ही न थी तुझे वो जैकपोट मिल रही है, तकलीफ क्या है? हाँ यार हाँ .....। चरण को गले लगाकर बधाई कहकर पीठ थप-थापकर वे बाहर चले गए। चरण बहुत खुश हो गया वह तुरंत मेल का जवाब दे दिया कि वह दिए गए तारीख के दिन रूपोर्ट करने में सक्षम है। वह फूले न समाया। पूरे घर में ऐलान कर दिया कि उसे नौकरी मिल गई है। घर में यह खबर सुनते ही सभी लोगों ने उसे आशीर्वाद व बधाइयाँ दी। यह खुशखबरी उसने अपने सभी मित्रों को भी दे दी थी। पार्टी मनाने का दिन और जगह भी तय कर लिया। इतने में चरण की माँ ने जल्दी से पंचांग खोलकर देखा तो पता चला कि वह दिन खास अच्छा नहीं है। उसने तुरंत चरण से कहा कि वह कंपनी वालों से कहकर, और दो दिनों की मोहलत ले क्योंकि वह दिन भर्ती होने के लिए अशुभ है। चरण ने कहा-  मामा ने कहा भेज दो तो मैंने हाँ कह दी। अब बात पलटना अच्छा नहीं लगता प्लीज रहने दो। मैंने अपने दोस्तों से भी कह दिया है। दोस्तों का क्या है उनको फिर से बता देना- माँ ने कहा। अब दादा-दादी ने भी बदलने की सलाह दी। चरण ने एक अंतिम बार पिताजी का सहारा लेना चाहा।  पिताजी ने तटस्त होकर कहा- देख लो जो तुम्हें बेहतर लगे। सब अपनी-अपनी जगह सहीं हैं।  मैं क्या कह सकता हूँ इस बारे में? जो तुम्हें सही लगे.... मामा को फोन लगाया पर उनका फोन नहीं लगा। जैसे ही उसने मेल खोला, उसने देखा कि कंपनी वालों का जवाब पहले ही मौजूद है – ग्रीटिंग्स...... सी यू ऑन 17 मार्च। अरे!! कंपनी वालों ने एक घंटे में जवाब भी दे दिया?  अब यह देखकर वह फिर एक बार अपनी माँ के पास गया और कहा कि सत्रह मार्च के दिन उन्होंने तय कर दिया है।  अभी-अभी मेल आया है। फिर भी उसकी माँ नहीं मानी।  उसने चरण से पुचकार कर कहा- उसे रिक्वेस्ट करते हुए लिखेगा, तो वो मान जाएगा।  उसकी माँ ने भी अच्छा दिन देखकर उसे भेजा होगा इसलिए वह मेनेजर बन गया। मुझे उनका फोन लगाकर दे मैं उनसे बात करके मनवाती हूँ। इतनी दूर जा रहा हैमेरा मन अशांत रहेगा।  अच्छी तिथि में जाएगा तो हमें मुझे संतुष्टि रहेगी।  नहीं तो मेरा मन विचलित रहेगा।  मुझे नींद भी ठीक से नहीं आएगी। “क्या माँ मैं स्कूल का बच्चा थोड़े न हूँ कि तू मेरा वकालत करेगी मेनेजर से।  ठीक है मैं ही उन्हें फोन कर दूँगा।  चरण फोन करता है किन्तु उनके मेनेजर का फोन स्विच आफ आता है।  वह सोच में पड़ जाता है। थोड़ी देर के बाद वह विनम्रतापूर्वक एक पत्र लिखकर अपने मेनेजर को ईमेल कर देता है कि पूरी तैयारी के साथ दो दिनों बाद उपस्थित होगा। पहले वाले जवाब के लिए खेद प्रकट करते हुए, सत्रह मार्च के बजाय उन्नीस मार्च को उपस्थित हो सकने की बात लिखकर भेज दी। सोचा एक-आध घंटे में इसका जवाब भी आ जाएगा। दिन भर वह मेल का जवाब देखता रहा।  शाम के छ: बज गए थे लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया।  अब चरण का तनाव बढ़ता गया। सोचा- अब मुझे कल तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। रात भर नींद नहीं आई। शाम को जब मामा घर आया, तो देखा कि घर में उत्सव के माहौल के बजाए सब शांति से अपना-अपना काम पे लगे हुए हैं। जैसे कोई साँप सूंघ गया हो। चरण के उतरे हुए चेहरे को देखकर मामा समझ गया कि कुछ तो गड़बड़ अवश्य है। पूछा तो उसने सब कुछ बखान कर दिया। सुनते ही मामा ने कहा- तो यह बात है। मेल करने से पहले तुमने मुझे एक बार पूछ लिया होता, मैं दीदी को मना लेता। या फिर मेरा इंतजार करता।  चलो अब जो हुआ सो हुआ। बात दो दिनों के बाद जाने की है, कोई बात नहीं......  दोस्तों से एक और पार्टी मना लेना। खैर वहाँ से जवाब क्या आया? वही तो समस्या है मामा ! जवाब नहीं आया है।  सुबह एक घंटे के भीतर दिनांक तय कर दिया था और अब दिन खत्म हो गया जवाब नहीं आया।
    चरण अंदर आकार टी. वी. के सामने बैठ गया। भारत-पाकिस्तान का मैच प्रारम्भ हुआ और उधर चरण का ईमेल के जवाब की प्रतीक्षा प्रारम्भ हुआ।  भारत टॉस जीता और बल्लेबाज करने का निर्णय लिया। किन्तु अब उसे भारत-पाकिस्तान का मैच देखने का मूड भी चला गया। अपने दोस्तों का फोन का जवाब भी नहीं दे रहा।चरण की हालत देखकर उसका मामा आग बबूला होकर सीधे अपनी बहन के पास जाकर कहता है– “क्या किया तुमने अनुराधाउसे नौकरी लगी है।  वह नौकरी करने जा रहा हैकोई स्कूल नहीं जा रहा।  उसका सारा मूड खराब कर दिया।  पंचांग के चक्कर में पड़कर तुमने उसे उलझाकर रख दिया। उसे दबाव में डालने से अच्छा होता कि मुझसे या जीजाजी से एक और बार पूछ लिया होता..... पता नहीं यह प्रमाणित हुआ है या नहीं कि वह एक आज्ञाकारी पुत्र है किन्तु यह अवश्य प्रमाणित हो गया है कि तुम कितनी बेवकूफ हो। नौकरी है, किसी की बपौती नहीं कि मन-मर्जी कर सकें।  तुझे वह न नहीं बोल सका, अब उसकी हालत देख! अब जो भी होगा उसे स्वीकारने के लिए आप सब तैयार हो जाना। कभी-भी, भगवान के लिए ऐसे निर्णय मत लो। अब हम केवल मेल की प्रतीक्षा ही कर सकतें हैं और कुछ नहीं।”
    चरण का दिल बैठ गया। वह बेचैन हो उठा। उसने अपना फोन उठाया और बड़े मामा से मिलाया। उसने सोचा बड़े मामा ही कोई अच्छी-सी सलाह दे सकेंगे। हर छोटे-बड़े काम के लिए वह अपने बड़े मामा से ही सलाह-मशवरा करता है। उसके बड़े मामामामा ही नहीं बल्कि वे उसके आंतरिक मित्र भी हैं। किन्तु चरण की बातें सुनकर वे भी भड़क गए।  सलाह तो दूर वे उससे नाराज हो गए – “तेरी माँ भी ना......, अब फोन क्यों कर रहा है? तू ऐसा कैसे कर सकता हैसारी बात बिगाड़ दी तुमने। वे लोग कंपनी के एच आर होते हैं। तेरा ईमेल देखकर उन्हें तेरी कमजोरी का पता चल गया होगा। तुमने न आने का कितना सिल्ली कारण बताया है। बेवकूफ... अपनी बेवकूफी से तुमने अच्छी-ख़ासी नौकरी को ठोकर मार दी। तेरे जैसे उन्हें कई मिल जाएँगे।  तुझे अनुभव नहीं होने पर भी उन्होंने नौकरी दी और तू उसको हल्के में लिया! अब तू दूसरे इंटरव्यू के लिए तैयारी करना शुरू कर दे। यह नौकरी का अब केवल 50-50 का ही चांस है। चरण कुछ न बोला। गुस्सा उतरते ही बड़ा मामा शांत होकर कहा- चल कोई बात नहीं अगली बार ऐसी बेवकूफी मत करना। तू फोन अपनी माँ को देना एक बार” अपनी बहन से कहा- “क्योंरी क्या आवश्यकता थी तिथि-वीथि देखने कीजब वह अच्छा काम करने जा रहा होतो बुरा कैसे हो सकता हैतिथि गई तेल लेने..... तुमने ख्वामख्वा तिथि के नाम से उसे डरा दिया। उलझन में डाल दिया बेचारे को। क्यों बेकार की बातें करके उसे गुमराह करती होअगर उसे यह नौकरी मिलकर भी नहीं मिली तो वह अपने आप को कभी माफ नहीं कर सकेगा। क्या तू माफ कर सकेगी खुद कोतुम पर से और उस पंचांग पर से उसका विश्वास उठ जाएगा। क्या फिर कभी तुमसे सलाह लेगाअब कभी-भी वह अपना काम तुम से नहीं बताएगा। टाल देगा ऐसे ही संबंध बिगड़ते हैं। इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी तू ऐसी मूर्खता कैसे कर सकती हो....हाँ.....? चलो मैं अभी थोड़ा-सा व्यस्त हूँ... शाम को फोन करूंगा।  बाय....”
    माँ-बेटे का मूड देखकर छोटे मामा ने कहा- “चलो कोई बात नहीं। ज्यादा दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। जो हो गयासो हो गया और जो भी होता हैहमारे भले के लिए ही होता है। कोई बात नहीं चीयर-अप यार.....  पाकिस्तान बेटिंग कर रही हैचल मैच देखते हैं....” चरण मैच के सामने तो बैठ गया किन्तु उसका पूरा ध्यान अपने लैपटाप पर ही था। किसी न किसी बहाने उठकर अपना लैपटाप या मोबाइल में मेल बाक्स देखने लगा। भारत 300 रन किए और पाकिस्तान को कड़ी चुनौती दी। विराट कोहली ने 107 रन बनाए। शानदार शतक से सभी खुश थे।  सभी का ध्यान मैच पर था और चरण का ध्यान कहीं और। अपनी गलती के कारण न वह खाना ठीक से खा सका और न ही उसकी माँ।  चरण का परध्यान और चुप्पी उसकी माँ और सभी सदस्यों को खल रहा था। औपचारिक रूप से सब एक दूसरे से बातें कर रहे थे किन्तु माहौल असुविधाजनक ही बनी रही।
    इतने में चरण का एक और करीबी मित्र बहुत ही जोश में फोन किया और उसे बधाइयाँ दी। नौकरी के बारे मेंइंटरव्यू के बारे मेंजगह के बारे में विवरण पूछ रहा था। चरण बहुत ही असुविधा का अनुभव कर रहा था। फिर भी बात को संभालने का प्रयत्न कर रहा था। जैसे-तैसे उससे निपट कर फोन रखी ही थी कि बगल वाली आंटी ने चरण के पास आकार हाथ मिलाया और कहा- बधाई हो बेटा... फोन पर तुम्हारी बातें मैंने सुन ली है। नौकरी मिल जाने के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ.... वेरी गुडवेरी गुड।  मुझे भी पार्टी देना होगा.... वैसे कब ज्वाइन कर रहे होचरण हिचकिचाते हुए कहा- थैंक्यू आंटी.... अभी डेट नहीं आया है। आते ही बता दूँगा। चलता हूँ आंटी।  रहोगे न दस दिनहाँ आंटी रहूँगा। आंटी बाय करके चला गई।
       पड़ोसी मैच के हर गेंद पर चिल्ला रहे थे। मैच खत्म होने के लिए बहुत कम गेंद रह गए थे। सभी लोग मैच का आनंद उठा रहे थे। विश्वकप में भारत कभी भी पाकिस्तान से नहीं हारा था। इस बार भी पूरी उम्मीद थी कि भारत फिर से जीत जाएगा। हर गेंद पर लोग चिल्ला-चिल्लाकर मजे ले रहे थे। हर विकेट पर शोर मचाते। किन्तु चरण चुपचाप अकेला आँगन में अपने सिर का भार पेड़ पर डालकर मौन बैठा था। भारत-पाकिस्तान स्पर्धा में भारत जीत गया। पड़ोसियों के बच्चे फटाके फोड़ने लगे। चरण का मामा ढूँढता हुआ बाहर आया और चरण को देखकर हँस पड़ा और कहा- “हा हा हा... क्या चरण अपनी नौकरी का मातम माना रहा है क्यादेखो चरण हर व्यक्ति ऐसे ही अनुभवों से सीखता है। जीवन का नाम ही नई बातों को सीखना है। जो कुछ भी हुआउससे कुछ न कुछ तो सीखा होगा न तुमनेपहले परामर्श कर लेता और मेल करता तो ठीक रहता। आराम से जवाब दे सकता था। तुमने खुशी के आवेश में पहले मेल का जवाब दे दिया फिर घर में बताया। जब तुम्हारे पक्ष में समाधान थातब तुम्हें जल्दी करने की क्या आवश्यकता थीधीरज से काम लेते तो कितना अच्छा होता। किसी भी समस्या का हल यूँ हाथ में हाथ धरे बैठने से नहीं होता है। चल हम बाहर टहलकर आइस्क्रीम खाकर आएँगे। तेरी माँ भी तेरे ही भलाई के लिए सोच रही थी। उसमें उसकी गलती भी नहीं है। वह तुम्हारी चिंता करती है। चल चलते हैं। तुझे अच्छा लगेगा। चलना......” आइसक्रीम खाते समय बड़े मामा का फोन आ गया। फोन पर चरण को डांट तो दिया था किन्तु उनसे रहा नहीं गया।  उन्होंने - चरण से पूछा कि ईमेल का उत्तर आया या नहींचरण ने कहा- “नहीं बड़े मामा अभी आइसक्रीम खाने छोटे मामा के साथ बाहर हूँ "  बड़े मामा ने कहा - "घर जाकर अभी मेल बाक्स देख लेना शायद अभी मेल का जवाब आ गया हो।  क्या पता भारत-पाकिस्तान के मैच के चक्कर में उसने अभी जवाब दिया हो!  करीबन दो घंटे बाद चरण घर जाते ही अपना लैपटाप पे चेक कियातो मेल बॉक्स में एक मेल आया हुआ था।  मेनेजर का ही था।  वह आतुरता से मेल खोला और पढ़ा।  उसमें लिखा था – “कोई समस्या नहीं है।  आप उसी दिन रिपोर्ट कर सकते हैं।  शुभकमानाएँ!” इस बार चरण और जोर से चिल्लाया- “मान गया......  माँ-माँ वह मान गया... छि: अगर मुझे थोड़ा भी आभास होता कि वह भी मैच देख रहा होगाइसलिए वह जवाब नहीं दे रहा थातो मैं भी मैच का आनंद उठता।” उसके छोटे मामा ने कहा-  “कोई बात नहीं कल रीप्ले देख लेना।”