बीस वर्ष का आर्यन अपनी माता-पिता, संजय और श्रद्धा का एक मात्र संतान है। वे नागपुर में रहते हैं। वह समझदार और होनहार युवक है।संजय एक सरकारी काम करता है और श्रद्धा केवल गृहस्थी को सुचरू रूप से चलाना ही अपना धर्म समझती है।आर्यन में भी अपनी माँ की शालीनता और अनुशाशन की छाप नज़र आती है। दादी साल में चार महीने नागपुर रहने आती थी। दादाजी जाने के बाद तीनों बेटों ने दादी को चार-चार महीनों के लिए बाँट लिया था। दादी को भी जगह बदलने के बाद नए माहौल में अच्छा लगता था किन्तु कुछ दिनों बाद दूसरे पोते-पोतों की याद आती थी तो वे चली जाती थीं। ज़्यादातर वह सबसे छोटे बेटे के घर चली जाती थीं क्योंकि उनके बच्चे छोटे थे तो उनके छोटे-छोटे काम करते हुए उनका मन बहल जाया करता था।
संजय के बाद का भाई हैदराबाद में रहता था। अपने दो बच्चों के साथ वह वहीं बस गया था| दूसरा भाई अपने तीन बच्चों के साथ एक छोटे से गाँव में रहता था|आर्यन की दादी को गाँव में रहना ज़्यादा अच्छा लगता था क्योंकि बच्चों के अलावा दादी को वहाँ का माहौल, लोग, हवा-पानी के अलावा पड़ोसियों को जानती थी, बाजार जा सकती थी, मंदिर जाना जैसे काम अकेले कर पाती थी| दादी को नागपुर जाना भी थोड़ा बहुत पसंद था किन्तु हैदराबाद जाने का मन नहीं करता था क्योंकि उन्हें भाषा भी नहीं आती थी| सिर्फ परिवार जनों से ही बोल सकती थी| दूसरों को देखकर केवल मुस्कुराकर रह जाती थी| कोई कुछ पूछता तो कहती ‘तेलुगु नहीं’
संजय के ऑफिस जाने के बाद आर्यन कालेज चला जाता था| उनके जाते ही वह श्रद्धा से बातें करती, कभी-कभी स्वयं को व्यस्त रखने के लिए, मना करने पर भी छोटे-मोटे काम करती हुई अपनी विगत स्मृतियों को ऐसे बताती थी जैसे अभी-अभी घटित हुआ हो| कभी-कभी काम न होने पर दादी पूजा-पाठ का समय बढ़ा लेती।

