Friday, 23 October 2015

लेख




हिन्दी का वैश्विक संदर्भ

वैश्विक धरातल पर हिन्दी सिनेमा दशा एवं दिशा
   
          सिनेमा मनोरंजन जगत का उत्कृष्ट साधन है।  पहले सिनेमा समाज में सीमित लोग ही देख पाते थे।  शहरों में रहने वाले लोग सिनेमाघर जाकर बड़े पर्दे पर सिनेमा देखते थे और उनका सम्पूर्ण आनंद ले पाते थे।  किन्तु टेलीविज़न का चमत्कारी आविष्कार ने उन्हीं सिनेमाओं को, छोटे रूप में घर-घर पहुँचाया।  वर्तमान समय में टेलीविज़न एक ऐसा साधन बन गया है, जिसके द्वारा मनोरंजन की कल्पना न के समान है।  बड़े पर्दे पर सिनेमा देखने की अवस्था होने पर भी प्रत्येक वर्ग के लोग अपने घरों में टेलीविज़न भी रखते हैं और उसका लाभ भी उठाते हैं। 
          भारत देश में सर्वप्रथम 1913 में बनाई गई 'आलमआरा', 'सत्यहरिश्चंद्र' सिनेमाएँ वैश्विक धरातल पर केवल मानवमूल्यों के संदर्भ में ही लिया जा सकता है।  किन्तु यह केवल एक प्रयोगात्मक प्रक्रिया थी।  हिन्दी भाषा के मूल्यांकन के रूप में नहीं।  इसका प्रदर्शित समय भी कम होता था।  क्योंकि उक्त सिनेमाएँ मूक सिनेमाएँ थी।  जिनमें केवल अभिनय किया जाता थास्थिति, संदर्भ और विषय स्लाइड पर लिखावट के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता था। स्वतन्त्रता के उपरांत आईं कुछ सिनेमाओं को वैश्विक धरातल पर अवश्य लिया जा सकता है।  40 से 60 दशक तक जो सिनेमाएँ बनतीं थीं, वे सामाजिक एवं भारतीय जीवन शैली से ओतप्रोत हुआ करतीं थीं।  कालांतर में विभिन्न प्रकार की सिनेमाएँ जैसे – सामाजिक, व्यक्तिगत, मनोवैज्ञानिक, सत्यकथाएँ, तिलिस्मी, रहस्यात्मक, भयानक, आपराधिक, पारिवारिक आदि आईं।   इनके अलावा शनैः-शनैः सिनेमाओं में असामाजिक तत्व भी जुड़ते चले गए।   जिनका प्रभाव हिन्दी भाषा पर भी पड़ा।   
          रंगमंच पर खेले जाने वाले नाटकों की भाषाई एवं व्यावहारिक गरिमा सर्वदा होती थी और उसे जारी रखने का प्रयत्न भी किया जाता है।  आरंभ में बने भारतीय फिल्मों में भी इस प्रकार की गरिमा बनाए रखने का प्रयत्न किया जाता था।  किन्तु फिर भी नाटक की तुलना में फिल्मों में अभिनय किंचित भिन्न होता है।  यह अंश अत्यंत विस्तृत और उक्त विषय से परे है।  इसलिए ऐसे तथ्यों पर प्रकाश डालना अनावश्यक है।   उच्च विचार सर्वदा भाषा के उच्च स्वरूप को प्रतिबिम्बित करता है।  उदाहरण के लिए पूरब और पश्चिम सिनेमा में यही छवि दृष्टिगोचर होती है।  इस सिनेमा में भारत नामक युवक विदेश जाता है।  वहाँ शर्मा जी की बेटी प्रीति उससे विवाह करना चाहती है।  किन्तु बचपन से विदेश में पली-बड़ी होने के कारण वह भारतीय संस्कृति को न वह जानती है, मानती है, और न ही अपनाना चाहती है।  शर्मा जी चाहते हैं कि उनकी बेटी भारत से विवाह कर हिंदुस्तान में बस जाए।  भारत प्रीति से प्रस्ताव रखता है कि, विवाह से पहले एक बार वह उसके साथ हिंदुस्तान आए।  प्रीति केवल एक बार जाने के लिए राजी हो जाती है।  प्रीति के पिता शर्मा जी डरते हैं कि अगर प्रीति को हिंदुस्तान पसंद नहीं आएगा तो भारत को भी उन्हीं की तरह विदेश में बिना इच्छा के रहना पड़ेगा।  वह चिंतित हो जाता है और भारत से इसकी चर्चा करता है।  यथा –
शर्मा      : भारत ये क्या वचन दे दिया तुमने?  बेटे!  हिम्मत हार गए हो या मजबूरी के सामने सर झुका दिए?
भारत     : नहीं ये बात नहीं है
शर्मा      : तो फिर ये वचन क्यों दे दिया तुमने...? तुम वापस आओगे?  यहाँ बस जाओगे?
भारत     : अगर प्रीति वापस आए तो
शर्मा      : बेटे ! जो तुम सोच रहे हो अगर वो नहीं हुआ तो?
भारत     : वचन दिया है वापस आऊँगा।  मगर नहीं चाचाजी ऐसा नहीं होगा।  अपने यहाँ जो मिट्टी की खुशबू है न वो तो अजनबी के साँसों में भी संस्कार भर देती है, ये मेरा विश्वास है। 
          उक्त संवाद में एक भारतीय युवक का देश प्रेम और बेटी के पिता का छटपटाहट दृष्टिगोचर होता है।  यह सेनेमा विषय के अतिरिक्त गाने के बोल, अभिनय और संवादों के लिए प्रसिद्ध है।  जिसकी भावनाओं को वर्तमान युवा पीढ़ी भी अनुभव करती है।  अचेतन और अवचेतन अवस्था में छिपी हुई भावनाएँ इस प्रकार के सिनेमा से बहिर्गत होते हैं।  इसी प्रसंग को हालही में आए सिनेमा नमस्ते लंदन सिनेमा में, अर्थात् सैंतीस वर्ष के उपरांत पुनः पूरब-पश्चिम सिनेमा के विषय पर निकाली गई सिनेमा में, दबंग रूप से संवादों की प्रस्तुति की गई।  भाषाई रूप से तुलना किया जाय तो हमें यह विदित होता है कि 'पूरब और पश्चिम' की तुलना में  नमस्ते लंदन सिनेमा की भाषा हल्की, व्यंग्य, मिश्रित और सरल है।  वर्तमान सिनेमाओं में भाषाई गरिमा से भी भावनाओं की प्रस्तुतीकरण को अधिक महत्व दिया जा रहा है।  यथा –
अर्जुन    : (जसमीत की ओर देखते हुए) उसके परदादा ने कुछ और इंडिया देखा है।  असल इंडिया की सैर करवाते हैं उसको....... 5000 साल पुरानी सभ्यता के वजह से हम सबको ऐसे ही झुकके प्रणाम करते हैं।  ऐसी सभ्यता जिसमें कैथलिक प्रधानमंत्री कुर्सी एक सिख के लिए छोड़ देती है और एक सिख प्रधानमंत्री पद की शपथ एक मुस्लिम राष्ट्रपति से लेता है।  उस देश की बागडोर संभालने के लिए जिसमें 80 प्रतिशत के लोग हिन्दू हैं।  आपकी मातृभाषा अंग्रेजी पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा हमारे ही देश में घिसी जाती है।  और आपको शायद यह भी नहीं पता कि अंग्रेजी के ज़्यादातर शब्द संस्कृत से लिए गए हैं।  संस्कृत का शब्द मातृ मदर, भातृ बना ब्रदर, ज्यामेति बनी ज्यामेंट्री और त्रिकोण्मेत्रि बनी  ट्रिगनोमेट्री।  आपको शायद यह बात दिलचस्प लगेगी कि हमारे यहाँ 21 भाषाओं में 5600 अख़बार और 3500 मैगजीन छ्पती हैं, जिसे पढ़ने वालों की संख्या 12 करोड़, जो आपके देश के मुक़ाबले कई ज्यादा हैं।  चाँद तक पहुँच गए हम पर तब भी आप लोगों को हम हिंदुस्तानियों के हाथ में सिर्फ सांप की बीन ही नज़र आती है।  डॉक्टर्स, इंजीनीयर्स और साईं टिस्ट की गिनती में जनाब हम सिर्फ दो मुल्कों से पीछे हैं।  ये थी दिमाक की बात।  अब करते हैं ताकत की बात।  दुनिया में सबसे पहली फौज हमारी है।  आपके आगे फिर भी झुक के प्रणाम करता हूँ क्योंकि हम किसी को अपने से छोटा या कमजोर नहीं समझते।  नमस्कार!!
          इस प्रकार नमस्ते लंडन सिनेमा के माध्यम से यह भी दर्शाने का प्रयास किया गया है कि वर्तमान भारत प्रत्येक क्षेत्र में वैश्विक धरातल पर अन्य देशों के प्रत्याशी के रूप में खड़ा है।  हर सतह पर समर्थता का परिचय देता रहा है।  स्वतन्त्रता का 69 वाँ वर्षगांठ मनाता भारत का मनोबल आज बहुत दृढ़ है।  नमस्ते लंदन एवं पूरब-पश्चिमसिनेमाएँ भारत का गौरवपूर्ण पहलू का प्रस्तुतीकरण है।   किन्तु भाषा में हिंदीतर शब्द अधिक और भाषा का स्तर फिसलता दृष्टिगोचर होता है।
          वर्तमान सिनेमाओं में तकनीकी एवं दृश्यात्मकता को अधिक महत्व दिया जा रहा है।  तकनीकी और वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर वैश्विक धरातल पर मूल्यांकन या तुलना किया जा रहा है।  हलही में बनी फिल्में जैसे – बाहुबली’, क्रिश’, मक्खी’, लाइफ ऑफ पै आदि उक्त तथ्य के अच्छे उदाहरण हैं।  ऐसी सिनेमाएँ असहज और अवास्तविक होते हैं।  मानवेतर शक्तियों द्वारा असंभव कार्य करने में सक्षम होने वाले मनुष्यों की भाषा तकनीकी या यान्त्रिकी होती है।  कुछ शब्द तो केवल उस पात्र के लिए ही सृजित की गई होती है जिसका शब्दकोश में अर्थ नहीं मिलता।  हॉलीवुड के फिल्मों में भी ऐसी फिल्में यदाकदा बनती ही रहती हैं।  जैसे – अवतार’, एलियन’, हैरीपॉटर की कहानियाँ ’, पायरेट्स ऑफ केलीबीन के सभी भाग जैसी फिल्में अवास्तविक होते हुए भी अपनी दृश्यात्मकता के कारण रोमांचित बन पड़े हैं।  इनमें भी भाषा की गरिमा का कोई महत्व नहीं होता।  मात्र सम्प्रेषण करना होता है।
          कुछ सिनेमाएँ राष्ट्रीय धरातल पर बहुत सफल होती हैं, किन्तु वैश्विक धरातल पर अपनी जगह नहीं बना पाती क्योंकि उनमें निहित संकल्पना विदेशी प्रेक्षकों को रंजित नहीं कर पातीं।  मुहावरों और कहावतों की भाषा हिंदीतर प्रांत के लोगों को कठिनाइयों में डाल देती है।  जैसे – "घर में जवान बेटी सीने पे पत्थर की सील की तरह होती है, हमारे जाने बिना यहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता" आदि।  कुछ फिल्मों को समझने हेतु प्रेक्षक को उस परिवेश की सभ्यता, संस्कृति, रहन-सहन, जाती-पाती, ऊँच-नीच, परंपरा और मानसिकता जैसे कई पहलुओं का जानकारी होना अवश्यंभावी हो जाता है अन्यथा संवाद की गंभीरता, भाषा का घुमाव, वाक्यांश एवं अभिव्यक्ति नहीं समझ पाते हैं।  ऐसी फिल्म से उन्हें रसानंद प्राप्त नहीं होता।  यथा –
स्वदेश सिनेमा में मोहन भार्गव नामक एक भारतीय नौजवान, जो नासा में वैज्ञानिक है, भारत आता है और अपने देश की दयनीय स्थिति को देखकर बहुत दुखी होता है।  वहाँ कुछ दिन रहने के उपरांत उसे वहाँ की जनता से लगाव हो जाता है।  वह गाँव में बदलाव लाना चाहता है।  गाँव के गरीब बच्चों को शिक्षित कराना चाहता है किन्तु गाँव के पंचों की भी अपनी जिद होती है।  यथा –
" पंच     : जो कभी नहीं जाती, उसी को जाती कहते हैं। 
मोहन    : जो सदियों से आ रही है, तो जरूरी नहीं है कि वह सही है।  मैं सिर्फ वही कह रहा हूँ जो आप लोगों के बीच कुछ दिन रहकर मैंने महसूस किया है।  देखा वो ये कि हम लोग सिर्फ आपस में लड़ते रहते हैं।  जबकि हमें लड़ना चाहिए अशिक्षा के लिए।  बढ़ती आबादी भ्रष्टाचार के खिलाफ।  हममें से हर कोई हर रोज गलियों में सड़कों पे कहीं न कहीं ये कहता रहता है कि इस देश का कुछ नहीं होने वाला।  यह देश बरबादी की ओर बढ़ रहा है।  हम सिर्फ यही कहते रहें तो सचमुच यह देश एक दिन बर्बाद हो जाएगा।  उसके लिए आपको कुछ करना होगा, आपको भी।  सिर्फ पंचों को नहीं।  आप सब गाँव वालों को आप अपनी समस्याओं के लिए इन पंचों को दोषी ठहरा रहें हैं लेकिन उनकी जगह पर आकार आप भी वही करेंगे।  और यह बात मुझ पर भी लागू होती है।  दलित ब्राह्मण को दोष देते हैं।  ब्राह्मण कहते हैं कि दलित उनकी जाती का भ्रष्ट कर रहें हैं।  लुहार और कुम्हार लाला के कर्ज को दोष देते हैं।  जमींदार किसान को दोष देते हैं लेकिन उसका हक नहीं देते हैं तो हम महान कैसे हो गए?  गाँव में दिक्कतें हैं तो हम सरकार की ओर उंगली उठाते हैं।  वो किसी और की ओर उंगली उठाते हैं।  हम सब किसी और को दोष दे रहें हैं जबकि सच्चाई यह है कि हम सभी दोषी हैं क्योंकि समस्या हम खुद ही हैं।  मैं, आप हम सब....
             मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि एक व्यक्ति जुलाहा जिसने खेती-बाड़ी करनी चाही, वह अपने परिवार को दो वक्त की रोटी नहीं दे सकता।  वह अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दे सकता।  जो भूख से मरता देख सकता है....."
          इस प्रकार गंभीर समस्या का चर्चा या संवाद हो रहा हो तो गैर-भारतीय जिन्हें जमींदारी पद्धति, गाँव का परिवेश, परंपरा, जलवायु संबंधी जैसे तथ्यों की जानकारी नहीं होती, उन्हें इस प्रकार की फिल्में बोरियत उत्पन्न करती है।  फिर भी कुछ फिल्में, वैश्विक स्तर महत्वपूर्ण होते हैं, जिन्हें प्रांतीय भाषाओं में अनुवादित कर देते हैं या फिर अनुवादित कथोपकथन तत्काल पटल पर प्रस्तुत हो रहा होता है।  वर्ष 2004 मैं बनी स्वदेश राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित थी किन्तु अन्य व्यावसायिक फिल्मों की तरह व्यापार कर पायी यह कहना कठिन है।   
         

पिछले दो दशकों में, विदेशी बाल कार्टून सिनेमाएँ जैसे – लाईन किंग (1,2), मेडागास्कर (1,2,3), नीमो’, टिनटिन’, ब्रेव’, कुम्फू पांडा (1,2), कार्स’, प्लेन्स आदि।  बहुत प्रचलित हुईं और वैश्विक धरातल पर एक विशेष जगह बनाई।  इनके अलावा हॉलीवुड में ऐसे मानवेतर शक्तिशाली पात्र ही-मैन’, बैट-मैन’, स्पाइडर-मैन’, सुपर-मैन’, आइरन-मैन आदि, जो अच्छे और गरीबों की मदद करते हैं, को प्रांतीय भाषाओं में अनुवदित कर प्रस्तुत की जाती है।  जिनकी भाषा सर्वदा हल्की ही होती है।  अंग्रेजी के कई शब्द ज्यों का त्यों प्रयोग कर दिया जाता है।  उक्त सभी बच्चों की फिल्में वैश्विक धरातल पर अपना विशेष स्थान बनाएँ हैं।  संसार के सभी बच्चे इन पत्रों से परिचित हैं।  टेलीविज़न के क्षेत्र में भी कुछ पात्र जैसे टॉम और जेरी’, डोरेमोन
, बग्स-बनी’, मिकी-माऊस’, एंग्री-बर्ड्स आदि हिन्दी में या भारत के अन्य प्रांतीय भाषाओं में भी वार्तालाप करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं।  इस प्रकार सिनेमा और दूरदर्शन का मंच वैश्विक धरातल पर हिन्दी तथा उक्त तथ्यों को पुष्टि करती है।  विशेष रूप से बाल कथाओं का मंच पूरे विश्व का सार्वजनिक मंच बन चुका है। 

          तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में विकास होने के उपरांत हॉलीवुड के द्वारा सृजित कुछ अद्भुत और अवास्तविक दृश्य एवं पात्र (अवतार) इतने प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किए गए हैं कि उनके दृश्य वास्तविक लगते हैं।  इस प्रकार का प्रयोग अब हिन्दी फिल्मों में भी (रोबो) यादकदा दृष्टिगोचर होने लगे हैं।  गाँव और छोटे शहरी उन सिनेमाओं से आनंद प्राप्त करते हैं।  किन्तु महानगरीय वासी मूल सेनेमा को ही देखने में इच्छुक होते हैं।  ये लोग फिल्मों की तुलना और मूल्यांकन करने में सक्षम होते हैं।  इसलिए ऐसे दर्शकों को फिल्मों की कसौटी के रूप में मान सकते हैं।  
        
  80-90 के दशक में भारत की कुछ फिल्मों में संवाद शैली अत्यंत मनोरंजक एवं प्रभावशाली थे, जिसके कारण कुछ हिन्दी फिल्में सुपर हिट हुईं  और सदाबहार बनकर रह गईं।  ऐसी सिनेमाओं को केवल हिन्दी प्रांत के लोग ही नहीं बल्कि हिंदीतर प्रांत और विदेशों में अब स्मरण करते हैं और उन्हें बारंबार देखते हैं।  यथा –
शरम यहाँ का सबसे अनमोल गहना है” (पूरब और पश्चिम, 1970)
जो डर गया , समझो मर गया” (शोले, 1975)
डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है” (डॉन, 1978)
जाओ उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे हाथ पर ये लिख दिया था... उसके बाद..... उसके बाद भाई तुम जिस कागज़ पे कहोगे, मैं उस पर साइन कर दूंगा” (दीवार, 1979)
मैं आज भी फेके हुए पैसे नहीं उठाता (दीवार, 1979)
हम भी वो हैं, जो कभी किसी के पीछे नहीं खड़े होते हैं।  जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है” (कालिया, 1981)
आई केन वाक इंग्लिस, आई केन लॉफ इंग्लिस बिकाज इंग्लिस ईस ए फन्नी लैंगवेज़” (नमक हलाल, 1982)
मोगेम्बो खुश हुआ” (मिस्टर इंडिया, 1987) आदि।
कोई बात नहीं सेनोरीटा कोई बात नहीं बड़े-बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहतीं हैं। (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे, 1995)
         उक्त सिनेमाओं के अलावा कुछ अत्यंत मनोरंजक सिनेमाएँ ऐसी भी हैं, जिनमें उद्देश्य की जगह अभिनय को महत्त्व दी गई।  चीनी कम’, लांच बाक्स’,
निशब्द’, पीके’, जो सामान्य मानवीय प्रवृत्तियों का ही प्रस्तुतीकारण है।  प्रेक्षकों में थोड़ा-सा कुतूहल उत्पन्न कर ढाई से तीन घंटों तक बांधकर रखने वाले उत्तम सिनेमा के दायरे में रखा जा सकता है।  इनमें निशब्द का विषय अनूठा था।  यह फिल्म साहसिक एवं निर्भीक अभिनय के लिए वैश्विक धरातल पर एक प्रयोग माना जा सकता है।  उसी प्रकार पीकू’, एक बुजुर्ग की कब्ज की बीमारी को आधार बनाकर हास्य-व्यंग्य के रूप में परोसा गया।  समकालीन व्यवस्था तंत्र, तर्क-वितर्क ही दर्शकों को बाँधें रखने में सफल रहा। 
         निष्कर्ष रूप से यह कह सकते हैं कि वर्तमान सिनेमा वैश्विक धरातल पर अवश्य सफल हुई है किन्तु भाषाई स्तर के कसौटी में सफल नहीं हो पा रही है।  यह भी झूठ नहीं है कि सिनेमाओं के द्वारा हिन्दी की जो प्रचार प्रसार हुई है, शायद ही किसी और माध्यम से हुई होगी।  हिंदीतर प्रान्तों में हिन्दी स्टाइल या फैशन के लिए भी सीखते हैं।  टूटी-फूटी हिन्दी ही सही किन्तु बहुत प्रेम से सीखते हैं और उनका प्रयोग करते हैं।  सभी को विदित है कि सिनेमाएँ केवल व्यापार हो गईं हैं।  समाज और समाजोद्धार का कर्तव्य के बारें में सोचेंगे तो वही बात हो जाएगी कि "घोडा घास से दोस्ती कर लेगा तो खाएगा क्या"।  बुद्धजीवी सिनेमाएँ देखने सिनेमाघर नहीं जाते क्योंकि वे ही समझते हैं कि वे समाज के उत्तरदायी हैं।  समाज का संस्करण उनके साहित्य और व्यक्तित्व से है।  अगर वे मनोरंजन के लिए सिनेमाएँ देखते भी हैं, तो वो, जो भाषाई रूप से और भावनाओं में उच्च हैं।   इसलिए वे आज भी पुरानी फिल्में ही देखना पसंद करते हैं। 
जयहिंद
 जयहिंदी 

नई उड़ान : मैं दहलीज हूँ .......मैंबचपन में हूँ यौवन में भी...

नई उड़ान :
मैं दहलीज हूँ .......
मैंबचपन में हूँ यौवन में भी...
: मैं दहलीज हूँ ....... मैं बचपन में हूँ यौवन में भी अधेड़ उम्र में , और जरा में मैं सुख में हूँ और दुख में भी कल्पना में और स...

Wednesday, 26 August 2015

मैं दहलीज हूँ .....


मैं दहलीज हूँ .......

मैं बचपन में हूँ यौवन में भी
अधेड़ उम्र में, और जरा में
मैं सुख में हूँ और दुख में भी
कल्पना में और सत्य में भी
                                                               मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ
मैं राग में भी विराग में भी
मूल्यवान भी मूल्यहीन भी
हूँ मैं मुक्त और अधीन भी
जीवन में भी मृत्यु में भी
                                                                मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ
हूँ मैं मिहिर के तेज किरण में
और रजनीश की शीतलता में
हूँ मैं दुल्हन सी छटा बहार में
और विधवा सी सूखी डाली में
                                                            मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ
मैं शत्रु भी हूँ और मित्र भी
स्मृति में हूँ और विस्मृति में
हूँ सफल में और विफल में
हूँ भक्ति में और श्रद्धा में
                                                        मैं इनके मध्य बसी दहलीज़ हूँ
भौतिक सुखों से मैं हूँ तटस्थ
किन्तु जिजीविषा से हूँ अनुरक्त
मैं शोर भी और सन्नाटा भी
मैं कभी प्रश्न तो कहीं उत्तर भी
                                                    मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ
मैं व्यक्त भी हूँ और गुप्त भी
संगीत के सप्त सुरों में हूँ
हूँ इंद्रधनुषी मुझ में सब रंग
कभी अंधकार और तिमिर तम
                                               मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ
मैं आर-पार दोनों छोरों में
देव व दैत्य के मध्य में भी
मैं हर मनुज के विवेक में हूँ
मैं सब में हूँ और सब सा हूँ
                                             मैं इनके मध्य बसी दहलीज हूँ

जयहिन्द 

शारदा 



Saturday, 27 June 2015

तिथि गई तेल लेने (लघुकथा)

तिथि गई तेल लेने

         

 

    चरण अपने आँगन के एक छोर से दूसरे छोर तक चलते हुए बहुत ही तनावग्रस्त नज़र आ रहा था। बार-बार किसी को फोन करने का प्रयत्न कर रहा था। उसका सिर झुका हुआ एवं उसकी नज़र ऐसे ज़मीन को, एक टूक देख रहा थी जैसे अभी वहाँ से कोई जहरीली साँप या बिच्छू निकलेगा।  लगभग पंद्रह मिनट के बाद वह वहीं आम के पेड़ के नीचे बैठ गया।  घर के काम में व्यस्त होती हुई भी उसकी माँ की नज़र उस पर टिकी थी। बीच-बीच में उसे देख रही थी।  उसे समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे धीरज बँधाए। कैसे उसकी चित्त शांत कराए।
        आधे घंटे के बाद भी उसे वहीं अकेला टहलता दिखा तो उसे बहुत दुख हुआ और सोचा- हो न हो यह सब मेरा ही किया धारा है। लेकिन मैं क्या कर सकती थी?  इसमें मेरी क्या गलती है?  मैंने उसका भला करना चाहा था। जो भी होता है ईश्वर की मर्जी से होता है। मेरा क्या है मैं निमित्त हूँ और मैंने अपना धर्म निभाया। वह चरण के पास गई और धीरे से कंधे पर हाथ रखकर बोली- “मुझे माफ कर देना चरणऐसा कुछ हो जाएगा मैंने सोचा न था। सोचा था, मैं तेरी मदद कर रहीं हूँ। तेरा भला-बुरा मैं नहीं सोचूँगी तो और कौन सोचेगा बोल? चल अंदर......  चल मामा के साथ बातें करोगे तो सब अच्छा हो जाएगा। वो दो दिन यहाँ बिताने आया है फिर हैदराबाद चला जाएगा। ऐसा करो कि आज़ दोनों फिल्म देखने चले जाओ। बाहर कहीं अपनी मन पसंद का खाना भए खा लेना! कल रात भी तुमने ठीक से नहीं खाया था और इन बातों से मन भी हट जाएगा। ठीक है न?” माँ की बातें सुनकर उसने कहा-“आज़ इंडिया-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच है हमें कहीं नहीं जाना है।” अपनी घड़ी देखते हुए- “वैसे टाइम क्या हुआ है, चलो अभी दस मिनट में शुरू हो जाएगा। मामा क्या कर रहें हैं?” बात पलटते हुए माँ से कहा- “देख माँ जो होना था सो हो गया। मैंने आपको कुछ बोला क्या? नहीं ना.....अब जो आगे होगावह देखा जाएगा।  देखते हैं क्या करना है।  ज्यादा से ज्यादा क्या होगाजो सोचा था नहीं होगा। जान थोड़ी न नहीं चली जाएगी।  चलो। कितना सोचती हो। एक ही बात को पकड़कर इतना मत खींचो। चलो..... कोई बात नहीं मैं फिर से कोशिश कर लूँगा। और भी कई रास्तें हैं..... ठीक है न...अब चलो भारत-पाकिस्तान का वर्ल्ड कप देखते हैं.......” सॉरी चरण अगली बार मैं इस बात का ध्यान रखूँगी-माँ ने मायूस होकर कहा। दोपहर का भोजन अच्छे से खाऊँगा।  कल का कसर भी निकाल दूंगा ठीक है न .....!  अगली बार मैं भी ध्यान रखूँगा। छोड़ दो उस बात को..... चलो अंदर.....
    बैंगलुरु में इंजिनियरिंग पास करने के तुरंत बाद ही, किसी दोस्त के कहने पर, चरण ने एक्सपरिमेंट के तौर पे, पूने के एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी के लिए आवेदनपत्र भेज दिया। उसे उम्मीद थी कि उसे वह नौकरी आने से रही क्योंकि उन्हें कम-से-कम पाँच से दस साल के अनुभवी लोगों की जरूरत थी। चरण ने यह सोचकर आवेदनपत्र भेजा था कि कम से कम उसे यह ज्ञात हो जाएगा कि कंपनियों में इंटरव्यू कैसे लेते हैं, कैसे सवाल पूछते हैं वगैरह-वगैरह। इंटरव्यू की झलक से एक अवधारणा मिल जाएगी।  अच्छी प्रैक्टिस से दूसरे इंटरव्यूज अच्छे से दे पाएगा। कंपनी के लिखित परीक्षा में चयनित हो गया। अगले दिन इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। जाते ही कंपनी वालों ने पकड़ लिया कि अनुभवी नहीं है। उन्होंने वही पूछा- जब हमने अनुभवी लोगों के लिए इंटरव्यू रखा है तो आपने कैसे आवेदनपत्र भेज दिया? प्रश्न सुनते ही उसे विदित हो गया कि इस राउन्ड में पास होने से रहा। झूठ बोलेगा तो पकड़ा जाएगा। उसके प्रमाणपत्र ही प्रमाणित करते हैं कि यह अभी-अभी पास हुआ है। उसने सच कह दिया कि वह अनुभावी नहीं है। उन्होंने कहा कि अब अनुभवी नहीं हो तो क्या पूछें?  इतने में दूसरे व्यक्ति ने कहा- परीक्षा में तो अव्वल आए हो, ओके यू टेल मी अबाउट यूरसेल्फ़.....। चरण को यह प्रश्न अच्छा लगा। उसने जवाब खुद से शुरू किया था लेकिन जब पढ़ाई, प्रोजेक्ट आदि की बात आई वह अपने विषय के बारे में बताना शुरू कर दिया जिससे वहाँ बैठे जो इंटरव्यू ले रहे थे, उन्होंने विषय पर एक-एक कर प्रश्न करने लगे और वह बताता चल गया। इंटरव्यू के बाद जब वह बाहर आया, वह बहुत खुश हुआ।  सोचा इंटरव्यू तो बहुत आसान था। लोगों ने खमखाँ डरा दिया। बस केवल एक्सपीयरेन्स सर्टिफिकेट होता ना तो नौकरी मेरी पक्की थी। सोचा चलो यह तसल्ली रहेगी कि मैंने अपनी ओर से अच्छा किया। उन्होंने कहा कि इंटरव्यू का नतीजा दो दिनों में आपके मेल में मेसेज कर दिया जाएगा। थैंक्यू बोलकर बाहर आने के बाद उसे याद आया कि किसी काम के सिलसिले में मामा हैदराबाद से आने वाले थे, घर पहुँचगए होंगे। घर पहुंचते ही मामा ने पूछा इंटरव्यू कैसे किया तुमने? चरण ने सारी रामायण सुना दी। अब बस मेल का इंतज़ार करना है। अगली सुबह उठते ही उसने मेल देखा- मार्च सत्रह तारीख के दिन, सुबह दस बजे, कंपनी में रिपोर्ट करना है।उसके मामा बाहर किसी काम के सिलसिले में जाने के लिए जूते पहन रहे थे चरण की बातें सुनकर कहा- सोचना क्या है जिसकी उम्मीद ही न थी तुझे वो जैकपोट मिल रही है, तकलीफ क्या है? हाँ यार हाँ .....। चरण को गले लगाकर बधाई कहकर पीठ थप-थापकर वे बाहर चले गए। चरण बहुत खुश हो गया वह तुरंत मेल का जवाब दे दिया कि वह दिए गए तारीख के दिन रूपोर्ट करने में सक्षम है। वह फूले न समाया। पूरे घर में ऐलान कर दिया कि उसे नौकरी मिल गई है। घर में यह खबर सुनते ही सभी लोगों ने उसे आशीर्वाद व बधाइयाँ दी। यह खुशखबरी उसने अपने सभी मित्रों को भी दे दी थी। पार्टी मनाने का दिन और जगह भी तय कर लिया। इतने में चरण की माँ ने जल्दी से पंचांग खोलकर देखा तो पता चला कि वह दिन खास अच्छा नहीं है। उसने तुरंत चरण से कहा कि वह कंपनी वालों से कहकर, और दो दिनों की मोहलत ले क्योंकि वह दिन भर्ती होने के लिए अशुभ है। चरण ने कहा-  मामा ने कहा भेज दो तो मैंने हाँ कह दी। अब बात पलटना अच्छा नहीं लगता प्लीज रहने दो। मैंने अपने दोस्तों से भी कह दिया है। दोस्तों का क्या है उनको फिर से बता देना- माँ ने कहा। अब दादा-दादी ने भी बदलने की सलाह दी। चरण ने एक अंतिम बार पिताजी का सहारा लेना चाहा।  पिताजी ने तटस्त होकर कहा- देख लो जो तुम्हें बेहतर लगे। सब अपनी-अपनी जगह सहीं हैं।  मैं क्या कह सकता हूँ इस बारे में? जो तुम्हें सही लगे.... मामा को फोन लगाया पर उनका फोन नहीं लगा। जैसे ही उसने मेल खोला, उसने देखा कि कंपनी वालों का जवाब पहले ही मौजूद है – ग्रीटिंग्स...... सी यू ऑन 17 मार्च। अरे!! कंपनी वालों ने एक घंटे में जवाब भी दे दिया?  अब यह देखकर वह फिर एक बार अपनी माँ के पास गया और कहा कि सत्रह मार्च के दिन उन्होंने तय कर दिया है।  अभी-अभी मेल आया है। फिर भी उसकी माँ नहीं मानी।  उसने चरण से पुचकार कर कहा- उसे रिक्वेस्ट करते हुए लिखेगा, तो वो मान जाएगा।  उसकी माँ ने भी अच्छा दिन देखकर उसे भेजा होगा इसलिए वह मेनेजर बन गया। मुझे उनका फोन लगाकर दे मैं उनसे बात करके मनवाती हूँ। इतनी दूर जा रहा हैमेरा मन अशांत रहेगा।  अच्छी तिथि में जाएगा तो हमें मुझे संतुष्टि रहेगी।  नहीं तो मेरा मन विचलित रहेगा।  मुझे नींद भी ठीक से नहीं आएगी। “क्या माँ मैं स्कूल का बच्चा थोड़े न हूँ कि तू मेरा वकालत करेगी मेनेजर से।  ठीक है मैं ही उन्हें फोन कर दूँगा।  चरण फोन करता है किन्तु उनके मेनेजर का फोन स्विच आफ आता है।  वह सोच में पड़ जाता है। थोड़ी देर के बाद वह विनम्रतापूर्वक एक पत्र लिखकर अपने मेनेजर को ईमेल कर देता है कि पूरी तैयारी के साथ दो दिनों बाद उपस्थित होगा। पहले वाले जवाब के लिए खेद प्रकट करते हुए, सत्रह मार्च के बजाय उन्नीस मार्च को उपस्थित हो सकने की बात लिखकर भेज दी। सोचा एक-आध घंटे में इसका जवाब भी आ जाएगा। दिन भर वह मेल का जवाब देखता रहा।  शाम के छ: बज गए थे लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया।  अब चरण का तनाव बढ़ता गया। सोचा- अब मुझे कल तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। रात भर नींद नहीं आई। शाम को जब मामा घर आया, तो देखा कि घर में उत्सव के माहौल के बजाए सब शांति से अपना-अपना काम पे लगे हुए हैं। जैसे कोई साँप सूंघ गया हो। चरण के उतरे हुए चेहरे को देखकर मामा समझ गया कि कुछ तो गड़बड़ अवश्य है। पूछा तो उसने सब कुछ बखान कर दिया। सुनते ही मामा ने कहा- तो यह बात है। मेल करने से पहले तुमने मुझे एक बार पूछ लिया होता, मैं दीदी को मना लेता। या फिर मेरा इंतजार करता।  चलो अब जो हुआ सो हुआ। बात दो दिनों के बाद जाने की है, कोई बात नहीं......  दोस्तों से एक और पार्टी मना लेना। खैर वहाँ से जवाब क्या आया? वही तो समस्या है मामा ! जवाब नहीं आया है।  सुबह एक घंटे के भीतर दिनांक तय कर दिया था और अब दिन खत्म हो गया जवाब नहीं आया।
    चरण अंदर आकार टी. वी. के सामने बैठ गया। भारत-पाकिस्तान का मैच प्रारम्भ हुआ और उधर चरण का ईमेल के जवाब की प्रतीक्षा प्रारम्भ हुआ।  भारत टॉस जीता और बल्लेबाज करने का निर्णय लिया। किन्तु अब उसे भारत-पाकिस्तान का मैच देखने का मूड भी चला गया। अपने दोस्तों का फोन का जवाब भी नहीं दे रहा।चरण की हालत देखकर उसका मामा आग बबूला होकर सीधे अपनी बहन के पास जाकर कहता है– “क्या किया तुमने अनुराधाउसे नौकरी लगी है।  वह नौकरी करने जा रहा हैकोई स्कूल नहीं जा रहा।  उसका सारा मूड खराब कर दिया।  पंचांग के चक्कर में पड़कर तुमने उसे उलझाकर रख दिया। उसे दबाव में डालने से अच्छा होता कि मुझसे या जीजाजी से एक और बार पूछ लिया होता..... पता नहीं यह प्रमाणित हुआ है या नहीं कि वह एक आज्ञाकारी पुत्र है किन्तु यह अवश्य प्रमाणित हो गया है कि तुम कितनी बेवकूफ हो। नौकरी है, किसी की बपौती नहीं कि मन-मर्जी कर सकें।  तुझे वह न नहीं बोल सका, अब उसकी हालत देख! अब जो भी होगा उसे स्वीकारने के लिए आप सब तैयार हो जाना। कभी-भी, भगवान के लिए ऐसे निर्णय मत लो। अब हम केवल मेल की प्रतीक्षा ही कर सकतें हैं और कुछ नहीं।”
    चरण का दिल बैठ गया। वह बेचैन हो उठा। उसने अपना फोन उठाया और बड़े मामा से मिलाया। उसने सोचा बड़े मामा ही कोई अच्छी-सी सलाह दे सकेंगे। हर छोटे-बड़े काम के लिए वह अपने बड़े मामा से ही सलाह-मशवरा करता है। उसके बड़े मामामामा ही नहीं बल्कि वे उसके आंतरिक मित्र भी हैं। किन्तु चरण की बातें सुनकर वे भी भड़क गए।  सलाह तो दूर वे उससे नाराज हो गए – “तेरी माँ भी ना......, अब फोन क्यों कर रहा है? तू ऐसा कैसे कर सकता हैसारी बात बिगाड़ दी तुमने। वे लोग कंपनी के एच आर होते हैं। तेरा ईमेल देखकर उन्हें तेरी कमजोरी का पता चल गया होगा। तुमने न आने का कितना सिल्ली कारण बताया है। बेवकूफ... अपनी बेवकूफी से तुमने अच्छी-ख़ासी नौकरी को ठोकर मार दी। तेरे जैसे उन्हें कई मिल जाएँगे।  तुझे अनुभव नहीं होने पर भी उन्होंने नौकरी दी और तू उसको हल्के में लिया! अब तू दूसरे इंटरव्यू के लिए तैयारी करना शुरू कर दे। यह नौकरी का अब केवल 50-50 का ही चांस है। चरण कुछ न बोला। गुस्सा उतरते ही बड़ा मामा शांत होकर कहा- चल कोई बात नहीं अगली बार ऐसी बेवकूफी मत करना। तू फोन अपनी माँ को देना एक बार” अपनी बहन से कहा- “क्योंरी क्या आवश्यकता थी तिथि-वीथि देखने कीजब वह अच्छा काम करने जा रहा होतो बुरा कैसे हो सकता हैतिथि गई तेल लेने..... तुमने ख्वामख्वा तिथि के नाम से उसे डरा दिया। उलझन में डाल दिया बेचारे को। क्यों बेकार की बातें करके उसे गुमराह करती होअगर उसे यह नौकरी मिलकर भी नहीं मिली तो वह अपने आप को कभी माफ नहीं कर सकेगा। क्या तू माफ कर सकेगी खुद कोतुम पर से और उस पंचांग पर से उसका विश्वास उठ जाएगा। क्या फिर कभी तुमसे सलाह लेगाअब कभी-भी वह अपना काम तुम से नहीं बताएगा। टाल देगा ऐसे ही संबंध बिगड़ते हैं। इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी तू ऐसी मूर्खता कैसे कर सकती हो....हाँ.....? चलो मैं अभी थोड़ा-सा व्यस्त हूँ... शाम को फोन करूंगा।  बाय....”
    माँ-बेटे का मूड देखकर छोटे मामा ने कहा- “चलो कोई बात नहीं। ज्यादा दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। जो हो गयासो हो गया और जो भी होता हैहमारे भले के लिए ही होता है। कोई बात नहीं चीयर-अप यार.....  पाकिस्तान बेटिंग कर रही हैचल मैच देखते हैं....” चरण मैच के सामने तो बैठ गया किन्तु उसका पूरा ध्यान अपने लैपटाप पर ही था। किसी न किसी बहाने उठकर अपना लैपटाप या मोबाइल में मेल बाक्स देखने लगा। भारत 300 रन किए और पाकिस्तान को कड़ी चुनौती दी। विराट कोहली ने 107 रन बनाए। शानदार शतक से सभी खुश थे।  सभी का ध्यान मैच पर था और चरण का ध्यान कहीं और। अपनी गलती के कारण न वह खाना ठीक से खा सका और न ही उसकी माँ।  चरण का परध्यान और चुप्पी उसकी माँ और सभी सदस्यों को खल रहा था। औपचारिक रूप से सब एक दूसरे से बातें कर रहे थे किन्तु माहौल असुविधाजनक ही बनी रही।
    इतने में चरण का एक और करीबी मित्र बहुत ही जोश में फोन किया और उसे बधाइयाँ दी। नौकरी के बारे मेंइंटरव्यू के बारे मेंजगह के बारे में विवरण पूछ रहा था। चरण बहुत ही असुविधा का अनुभव कर रहा था। फिर भी बात को संभालने का प्रयत्न कर रहा था। जैसे-तैसे उससे निपट कर फोन रखी ही थी कि बगल वाली आंटी ने चरण के पास आकार हाथ मिलाया और कहा- बधाई हो बेटा... फोन पर तुम्हारी बातें मैंने सुन ली है। नौकरी मिल जाने के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ.... वेरी गुडवेरी गुड।  मुझे भी पार्टी देना होगा.... वैसे कब ज्वाइन कर रहे होचरण हिचकिचाते हुए कहा- थैंक्यू आंटी.... अभी डेट नहीं आया है। आते ही बता दूँगा। चलता हूँ आंटी।  रहोगे न दस दिनहाँ आंटी रहूँगा। आंटी बाय करके चला गई।
       पड़ोसी मैच के हर गेंद पर चिल्ला रहे थे। मैच खत्म होने के लिए बहुत कम गेंद रह गए थे। सभी लोग मैच का आनंद उठा रहे थे। विश्वकप में भारत कभी भी पाकिस्तान से नहीं हारा था। इस बार भी पूरी उम्मीद थी कि भारत फिर से जीत जाएगा। हर गेंद पर लोग चिल्ला-चिल्लाकर मजे ले रहे थे। हर विकेट पर शोर मचाते। किन्तु चरण चुपचाप अकेला आँगन में अपने सिर का भार पेड़ पर डालकर मौन बैठा था। भारत-पाकिस्तान स्पर्धा में भारत जीत गया। पड़ोसियों के बच्चे फटाके फोड़ने लगे। चरण का मामा ढूँढता हुआ बाहर आया और चरण को देखकर हँस पड़ा और कहा- “हा हा हा... क्या चरण अपनी नौकरी का मातम माना रहा है क्यादेखो चरण हर व्यक्ति ऐसे ही अनुभवों से सीखता है। जीवन का नाम ही नई बातों को सीखना है। जो कुछ भी हुआउससे कुछ न कुछ तो सीखा होगा न तुमनेपहले परामर्श कर लेता और मेल करता तो ठीक रहता। आराम से जवाब दे सकता था। तुमने खुशी के आवेश में पहले मेल का जवाब दे दिया फिर घर में बताया। जब तुम्हारे पक्ष में समाधान थातब तुम्हें जल्दी करने की क्या आवश्यकता थीधीरज से काम लेते तो कितना अच्छा होता। किसी भी समस्या का हल यूँ हाथ में हाथ धरे बैठने से नहीं होता है। चल हम बाहर टहलकर आइस्क्रीम खाकर आएँगे। तेरी माँ भी तेरे ही भलाई के लिए सोच रही थी। उसमें उसकी गलती भी नहीं है। वह तुम्हारी चिंता करती है। चल चलते हैं। तुझे अच्छा लगेगा। चलना......” आइसक्रीम खाते समय बड़े मामा का फोन आ गया। फोन पर चरण को डांट तो दिया था किन्तु उनसे रहा नहीं गया।  उन्होंने - चरण से पूछा कि ईमेल का उत्तर आया या नहींचरण ने कहा- “नहीं बड़े मामा अभी आइसक्रीम खाने छोटे मामा के साथ बाहर हूँ "  बड़े मामा ने कहा - "घर जाकर अभी मेल बाक्स देख लेना शायद अभी मेल का जवाब आ गया हो।  क्या पता भारत-पाकिस्तान के मैच के चक्कर में उसने अभी जवाब दिया हो!  करीबन दो घंटे बाद चरण घर जाते ही अपना लैपटाप पे चेक कियातो मेल बॉक्स में एक मेल आया हुआ था।  मेनेजर का ही था।  वह आतुरता से मेल खोला और पढ़ा।  उसमें लिखा था – “कोई समस्या नहीं है।  आप उसी दिन रिपोर्ट कर सकते हैं।  शुभकमानाएँ!” इस बार चरण और जोर से चिल्लाया- “मान गया......  माँ-माँ वह मान गया... छि: अगर मुझे थोड़ा भी आभास होता कि वह भी मैच देख रहा होगाइसलिए वह जवाब नहीं दे रहा थातो मैं भी मैच का आनंद उठता।” उसके छोटे मामा ने कहा-  “कोई बात नहीं कल रीप्ले देख लेना।”

Sunday, 10 May 2015

साहित्यकारों के साहित्यकार 'रवीन्द्रनाथ टेगोर'

रवीन्द्रनाथ टेगोर  
साहित्यकारों के  साहित्यकार 'रवीन्द्रनाथ टेगोर'
किसी भी साहित्यकार का व्यक्तित्व उसके द्वारा सृजित रचनाओं के द्वारा ही व्यक्त होता है।  जिसके अंतर्गत उनकी अभिव्यक्ति कौशलता, भाषा का ज्ञान, भाषा में प्रांजलता, संवेदनशीलता एवं उनकी प्रौढ़ता निहित होती है।  एक ही परिस्थिति, वस्तु या अवस्था के लिए विभिन्न लोगों के स्पंदन प्रक्रियाओं में भी पृथकता दृष्टिगोचर होती रहती है।  किसी भी व्यक्ति की स्पंदन प्रक्रिया उस व्यक्ति की मानसिक स्तर, सामर्थ्य के अनुरूप विचार एवं उसके अनुभवों के आधार पर ही निर्भर होता है।  उपर्युक्त तथ्यों से किसी भी व्यक्ति की परिपक्वता और व्यक्तित्व भी आँकी जा सकती है।    अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों के विचार और अनुभवों में पृथक होना प्रकृतिक भी है और अवश्यंभावी भी।  विचारों की पृथकता ही नए आयामों को जन्म देती हैं।  उदाहरण के लिए एक सुंदर फूल को देखकर एक स्त्री जैसे स्पंदित होती है, वैसे एक पुरुष नहीं होता, एक कवि जैसे सोचता है, ऐसा एक साधारण व्यक्ति नहीं सोच सकता, एक वनस्पति शास्त्र के ज्ञाता जिस दृष्टि से देखता है, वैसा एक भक्त नहीं देखता।  इस प्रकार इस संसार में सभी मनुष्य, परिस्थितियों और परिवेश के समान होने पर भी, उनकी आवश्यकताओं, विचारों, अनुभवों और मानसिक स्तर के अनुरूप उनकी दृष्टिकोण में भी पृथकता आ ही जाती है।  फिर भी हम यह अवश्य कह सखते हैं कि एक ही विषय या वस्तु के लिए अलग-अलग परिप्रेक्ष्य होने के कारण ही अलग-अलग विश्लेषण भी हमारे सम्मुख प्रस्तुत किए जाते रहें हैं।  इन्हीं मानसिक वैविध्यताओं के कारण ही साहित्य में भी पृथकता दृस्टिगोचर होती है।  चूंकि हम इस समय साहित्यकारों के साहित्यकार रवीन्द्र नाथ टेगोर के बारे में विचार कर रहें हैं, हम यह देखने का प्रयास करेंगे कि ये महान साहित्यकार, अन्य साहित्यकारों से किस प्रकार भिन्न हैं और क्यों महान हैं?   
एक साहित्यकार समाजिक होकर भी अन्य सामाजिकों से पृथक होता है।   चाहे फिर वह विश्व का कोई भी साहित्यकार क्यों न हो और संसार के किसी भी कोने में क्यों न बसा हो।  साहित्यकारों का हृदय जीतने वाला साहित्यकार ही विश्व साहित्यकार बनाता है।  भारत में 'रवीन्द्र नाथ टेगोर' ने उस प्रशस्ति को प्राप्त किया है।  उन्हें केवल भारतसियों ने ही नहीं, बल्कि समग्र विश्व ने प्रशंसा की है।  रवीन्द्र नाथ टेगोर केवल महान कवि ही नहीं बल्कि वे एक अच्छे उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककर, संगीतकार, शिक्षाविद एवं दार्शनिक भी थे।  उनकी रचनाओं में उपर्युक्त सभी तथ्य यदाकदा प्रतिबिम्बित होते ही रहते हैं।    
            रवीन्द्र नाथ टेगोर ने अपनी कहानियाँ तथा उपन्यास केवल बंगला भाषा में ही लिखा था किन्तु उन्हें सुनकर ही कई लोग प्रेरित हुए और प्रायः दुनिया के सभी भाषाओं के लोगों ने उन्हें अपनी भाषाओं में अनुवदित कर लिया।  उनकी कहानियों में उत्कृष्ट मानवीय प्रेम, मानवीय सम्बन्धों के विभिन्न पहलुओं की मार्मिक प्रस्तुति तथा मानवीय स्वाभिमान का भाव सिमटा हुआ दिखाई पड़ता है।  उपर्युक्त तथ्यों के अलावा उनकी कृतियों में बंगाली भाषा के प्रति प्रेम, उनकी बचपन की छवि, दर्शन, मानव संबंध, संवेदनशीलता, प्रकृति की छटा, वास्तविक आनंद जैसी भावनाएँ प्रस्फुटित होती हैं।  उनकी समग्र रचनाओं में 'गीतांजली' उत्कृष्ट विद्वत्ता की पराकाष्ठा है।
मातृभाषा के प्रति प्रेम
            कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभूमि में जितना स्वतंत्र्यता प्राप्त करता है, कदाचित ही कहीं और करता है।  उसी प्रकार अपने मन की भावनाओं को मातृभाषा में जितनी प्रभावशाली ढंग से व्यक्त कर सकता है, कदाचित ही किसी अन्य भाषा में कर सकता होगा।  मातृभाषा माँ के जैसी सरल और मार्मिक होती है।  इसी कारण रवीन्द्र की रचनाएँ भी बहुत प्रभावशाली बन पड़े हैं।  बंगला भाषा जानने वाले व्यक्ति यह तथ्य जानते हैं कि उनकी रचनाएँ गाने एवं पठन के लिए बहुत ही सरल हैं।  किन्तु यह बात भी स्पष्ट है कि उनकी रचनाएँ गाने के लिए जितनी सरल होती हैं, उनके भाव उतनी ही गंभीर, पैने, गूढ़ार्थ, स्तरीय एवं दार्शनिक होते हैं।  जब भारतीय अंग्रेजों की यातनाओं से त्रस्त थे, और उन्हें जीवन में कोई भी अपेक्षा नहीं रह गई थी।  ऐसी विषाद एवं दयनीय स्थिति में लोगों का मनोबल बढ़ाने हेतु कवि रवीन्द्र ने लोगों के लिए अपनी कविताओं द्वारा उनमें जीवन में नई स्फूर्ति और आशा जगाने का प्रयत्न किया।  यथा – "যদি তোর ডাক শুনে কেউ না আসে তবে একলা চলো রে" (यदि तोर डाक शुने केवु ना आशे तोबे एकला चोलो रे)। तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे।" इस गाने के द्वारा वे यही संदेश देते हैं कि अगर जीवन में कभी किसी का साथ न मिला, मदद नहीं मिली, अकेला हो गया हो, तो भी वह मायूस होकर न बैठे बल्कि अकेला निडर होकर जीवन में आगे बढ़े।  इस प्रकार रवीन्द्र बाबू ने समाज में बसे साधारण लोगों को सरल भाषा में अपनी कविता के माध्यम से मानसिक स्थैर्य बनाए रखने की चेष्टा की।  लोकप्रिय रवीन्द्र अपनी कहानियों में भी अपनी भाषा को प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।  सुंदर स्त्री से अपनी भाषा की तुलना कर भाषा की कोमलता को दर्शाते हैं। यथा - "बंगाली लड़की के मुख में बंगला बोली कितनी मधुर लगती है"[1]
            वे केवल भाषा प्रेमी ही नहीं थे बल्कि उनकी कृतियों के पठन से हमें यह ज्ञात होता है कि उन्हें भारतीय संस्कृति, सभ्यता और संस्कार से कितना प्रेम था।  उनकी सम्पूर्ण कृतियों में इनकी छटा यदाकदा दृष्टिगोचर होते ही रहते हैं।  उन्हें बंगाली संस्कृति और सभ्यता से विशेष लगाव था।  वे अपने प्रत्येक वाक्य में बंगाली 'पन' का इत्तर छिड़कने का प्रयास करते दिखाई पड़ते हैं।  उनकी रचनाओं में अपनी मातृभाषा के साथ-साथ अपनी मातृभूमि, गंगा नदी, पहनावा, वहाँ की स्त्रियाँ, उनका रहन-सहन जैसे कई तथ्य प्रतिबिंबित होते हैं।  यथा - "बंगाली तरुणी को निहारा था....."....."...."बंगाली बाला को पहली बार ही इस प्रकार से देखा कि उसका साहचर्य प्राप्त करने की उत्कृष्ट इच्छा जागृत हुई।  उसे देख कर प्रतीत नहीं होता था कि उसका संबंध पुस्तकों से टूटा या नहीं"[2]
बेटी के प्रति पिता का प्रेम 
            वर्तमान समय में वैवाहिक जीवन को लेकर स्त्री के जीवन में घुटन और कुंठित विचारों को जन्म दे रही है।  क्योंकि अब यह संस्कार दो परिवारों के बीच सत्संबंध की स्थापना कम और व्यापार का केंद्र अधिक बन गया है।  आश्चर्य की बात यह है कि वधू पक्ष के लोग अपनी बेटी के साथ-साथ वर पक्ष की सभी माँगे पूरे करते हुए भी स्वयं को असहाय अनुभव करते हैं।  अपनी बेटी के जीवन को लेकर व्याकुल रहते हैं।  सर्वधुनिक युग में भी प्रतिभा सम्पन्न स्त्री सुरक्षित नहीं है।  संस्कृति और परंपरा का नाम देकर असांस्कृतिक कार्य को ही बढ़ावा दिया जा रहा है।  स्त्री को एक व्यक्ति की दृष्टि से न देखकर उसे परंपरा, संस्कृति, संस्कार, मान-सम्मान जैसे भारी उत्तरदायित्व को ढोने का मात्र साधन माना जा रहा है।  मनुष्य जब से संस्कृति और सभ्यता का वास्तविक परिभाषा भूल गया है, तभी से मानव जीवन में और समाज में समस्याएँ प्रारम्भ हुए हैं।  अंधविश्वासों को संस्कृति, सभ्यता और परंपरा का नाम देकर एक ओर अपनी नुकसान कर रहा है तो दूसरी और आधुनिकता और विकास के नाम गलत मार्ग पर भटककर स्वयं को गर्त में डाल रहा है।  इसी तथ्य को प्रमाणित करते हुए रवीन्द्र नाथ ने अपनी एक कहानी 'अपरिचिता' में, नए रूप में प्रस्तुत किया है।  यथा -
            कल्याणी शंम्भूनाथ सेन की एक मात्र बेटी है, जिससे वह अत्यंत प्रेम करते हैं।  उन्हें अपनी बेटी को कुंवारी देख सकते हैं किन्तु विवाह के नाम पर व्यापार करना उन्हें कतई पसंद नहीं।  समाज के हर पिता कदाचित ऐसे ही सोचते होंगे, किन्तु व्यावहारिक रूप से वे कुछ नहीं कर पाते हैं।  परिस्थितियों के सामने हार मानकर हथियार डाल देते हैं और अंततः वे वही करते हैं जो वर पक्ष की मांग होती है।  किन्तु अगर उन परिस्थितियों से न घबराकर उनका सामना किया जाए, तो उसका परिणाम क्या हो सकता है?  ऐसा करने से अधिक से अधिक क्या नुकसान होगा? क्या वस्तुतः उतनी ही हानि होगी जितना उनका भय होता है?  उक्त प्रश्नों के समाधान के रूप में रवीन्द्र बाबू ने बहुत पहले ही 'अपरिचिता' कहानी की कल्पना की।  प्रेम से पाल-पोसने के उपरांत शंम्भूनाथ सेन अपनी कन्या का विवाह के लिए एक योग्य वर का चुनाव करता है किन्तु वर पक्ष के करतूतों को देखकर उनको मुँह तोड़ जवाब देता है।  वह अपने मनोबल को बनाए रखता है।  न शब्दों के बाण से उनकी मर्यादा को ठेस पहुंचता है और न ही अपनी आत्मसमान और प्रतिष्ठा पर आँच आने देता है।  यही व्यवहार भारतीय सभ्यता का मूलाधार है।      
            'अपरिचिता' कहानी में अनुपम (वर) के मामा सोने की आभूषणों की एक सूची बनाते हैं ताकि दहेज के रूप में जो दिखाया गया था, विवाह के बाद उसमें से कुछ कम न हो जाएँ।  किन्तु वधू के पिता जिस मात्रा में देने की बात तय करते हैं, वे उससे अधिक दर की एवं अधिक तौल की देते हैं।  वर के मामा विवाह में अपने साथ एक सुनार लेकर आते हैं ताकि दुल्हन के द्वारा धारण किए गए सभी गहनों की जांच ठीक तरीके से हो जाए।  वधू के पिता शंम्भूनाथ सेन वैसा ही करते हैं।  वर पक्ष की माँग के अनुरूप अपनी बेटी के सभी गहने  उतरवाकर जांच के लिए प्रस्तुत कर देते हैं।  उन सभी गहनों की जांच के पश्चात वधू के पिता उस इयरिंग की भी जाँच करवाते हैं, जो वर के मामा ने वधू को दिया था।  सुनार उसे भी जाँच करता है और कहता है कि "यह विलायती है और नकली है।"  तब वधू के पिता वर के मामा से कहते हैं "इसे आप ही रखें"। 
            सोने की जाँच के पश्चात वर के मामा अपने भांजे अनुपम से विवाह संस्कार के लिए बैठने के लिए कहते हैं तो शम्भूनाथ कहते हैं - "नहीं, अब सभा में बैठना नहीं होगा।  चलिये आप लोगों को खाना खिलादूँ...." खाना खाने के उपरांत वे पुनः कहते हैं – "आप लोगों को बहुत कष्ट दिया है मैंने।  हम लोग धनी हैं।  आप लोगों के योग्य व्यवस्था नहीं सकें, क्षमा करेंगे।  रात हो गई है, आप लोगों का कष्ट मैं और नहीं बढ़ाना चाहता।  तो फिर इस समय....।" भोजन के पश्चात वर के मामा कहते हैं - "तो सभा में चलिए, हम तो तैयार हैं।" तब शम्भूनाथ विवाह को स्थगित कर देते हैं और वे स्पष्ट रूप से कह देतें हैं - "तब आपकी गाड़ी बुलवा दूँ?"......"मज़ाक तो आप स्वयं कर चुके हैं।  मज़ाक के संबंध को स्थायी करने की मेरी इच्छा नहीं है""अपनी कन्या के गहने मैं चुरा लूँगा, जो व्यक्ति यह बात अपने मन में सोचता है, उसके घर में मैं अपनी कन्या नहीं दे सकता।"
            इस प्रकार वर्तमान समय में भी जिस विवाह संस्कार को अग्निपरीक्षा मानते हैं, रवीन्द्र बाबू ने उसका समाधान बहुत पहले ही कर दिया था।  छोटी सी कहानी 'अपरिचिता' के माध्यम से उन्होंने सही अर्थ में विवाह संस्कार, मान-मर्यादा, मानव-मूल्य, आदर्श की परिभाषा देने में सफल हुए।  एक कन्या का विवाह वहाँ होनी चाहिए जहाँ उसकी आत्मसम्मान का मान रखा जाता हो।
आनंद शब्द का सही अर्थ
संतुष्टि का पर्याय शब्द 'आनंद' है।  संतुष्टि किसी वस्तु या व्यक्ति की प्राप्ति से नहीं वरन् यह मनुष्य के मानसिक उपादान का नाम है।  मनुष्य का मस्तिष्क भौतिक जगत एवं उनसे संबन्धित लालसाओं का भंडार है।  ये लालसाएँ बारंबार एक के बाद एक कुकुरमुत्तों की तरह उग आते हैं।  अवांछित विषयों के पीछे दौड़ते-दौड़ते, उन्हें बटोरते-बटोरते मनुष्य अपनी जीवन की सारी शक्तियाँ, समय और ऊर्जा अज्ञात रूप से खोता चला जाता है। भ्रम रूपी बवंडर में फँसता चला जाता है।   उसी पद्धति को जीने का तरीका समझने लगता है।  भौतिक सामग्रियों के संचय में वह जीवन का अत्यधिक मूल्यवान समय खोता है और सामग्री प्राप्त करके वह स्वयं को योग्य, चतुर और उत्कृष्ट समझने लगता है।  किन्तु वास्तव आनंद का लाभ और उसका मूल्य तो उसे ज्ञात ही नहीं होता।  कई संतों की लालसा भी आनंद प्राप्त करना होता है।  संतों का 'आनंद' भी 'धन' है किन्तु वह भौतिक और स्थूल धन से भिन्न होता है।  -
गोधन, गजधन, वाजिधन, रतनधन खान।
जब आए संतोष धन, सब धन धूरि समान!!
'अपरिचिता' कहानी में, दहेज के चलते अनुपम का विवाह कल्याणी से रुक जाता है।  कुछ दिनों पश्चात अनुपम की भेंट कल्याणी से हो जाता है।  अनुपम कल्याणी को पहचान लेता है किन्तु कल्याणी अनुपम को नहीं पहचानती।  वह तब भी अविवाहिता ही रहती है।  अनुपम कल्याणी का स्वभाव देखकर उसे पसंद करने लगता है।  दोनों एक ही जगह कार्यरत रहते हैं।  अनुपम किसी भी परिस्थिति में कल्याणी से अपनी विवाह से संबन्धित बातें नहीं करता है।  वह केवल उसका साथ चाहता है।  वह इसलिए आनंदित है कि उसे जीवन संगिनी के रूप में न सही उसका साथ तो प्राप्त है।  - "तुम सोच रहे होगे, मैं विवाह की आशा करता हूँ।  नहीं, कभी नहीं।  मुझे याद है, बस उस रात के अपरिचित कंठ के मधुर स्वर की आशा – 'जगह है।'  अवश्य है।  नहीं तो खड़ा कहाँ होऊँगा?  इसी से वर्ष के बाद वर्ष बीतते जाते हैं, मैं यहीं हूँ।  भेंट होती है,  वही स्वर सुनता हूँ, जब अवसर मिलता है उसका काम कर देता हूँ और मन कहता है, यही तो जगह मिली है, ओ री अपरिचिता।  तुम्हारा परिचय पूरा नहीं हुआ, पूरा होगा भी नहीं, किन्तु मेरा भाग्य अच्छा है, मुझे जगह मिल चुकी है।"[3]
रवीन्द्र का दर्शन
            किसी भी व्यक्ति का बचपन भावी जीवन का आधार होता है।  इस तथ्य को वर्तमान मनोवैज्ञानिक चिकित्सकों ने भी स्वीकारा है।  मनुष्य के जीवन में शैशवावस्था अर्थात् जन्म से लेकर पाँच वर्ष के आते तक उसकी जीवन शैली का का ढांचा तैयार होकर स्थिर हो जाता है और उसी के अनुरूप वह जीवन में व्यवहार करने लगता है।  उसके बाद उसकी स्थिरता तभी भंग हो पाती है जब उसमें चिंतन की भावना जागृत होती है।  दूसरों को देखकर या प्रेरित होकर मनुष्य अनुकरण करने की चेष्टा करता है।  चाहे फिर वह उसके लिए हित हो या अहित।  ज्यों-ज्यों वह जीवन के अनुभव संचित करता आगे बढ़ता है, अनुकरण की प्रक्रिया कम होती जाती है और चिंतन चालू हो जाती है।  आयु के बढने पर भी कुछ लक्षण और परिवेशजन्य आदतें निरंतर उस व्यक्ति को संचालित करती रहती हैं।  चाहे फिर वे अच्छे हों या बुरे।  व्यक्ति जैसे-जैसे चिंतन करता रहता है, वह परिपक्वता की ओर बढ़ता जाता है।  रवीन्द्र अपने माता-पिता के पन्द्रहवी संतान थे।  किन्तु उनकी छोटी सी आयु में ही उनकी माता का देहांत हो गया था।  वे कम आयु में ही समझ गए थे कि जिस द्वार से वे गईं थीं, वहाँ से वे कभी नहीं लौटेंगी।  उन्हें अपनों से प्यार तो मिला किन्तु माँ की ममता का अभाव उन्हें उम्र से पहले ही दार्शनिक बना दिया था।  इस प्रकार परिवेश मनुष्य को प्रभावित करती है।   कहानी के माध्यम से वे एक जगह कहते हैं - "कल्पना से।  इसका कारण यह है की सच नीरव होता है और कल्पना वाचाल।  सत्य घटनाएँ भाव श्रोता को पत्थर की तरह दबाए रखती है, कल्पना ही उसका मार्ग मुक्त कर सकती है।"
मानव संबंध और संवेदनशीलता
            पशु-पक्षियों की तरह मनुष्य भी समुदाय में रहने वाला प्राणी है।  मानव समुदाय की पृष्टभूमि में सार्थकता की भावना निहित होती है।  वह समुदाय केवल साथ रहने के लिए नहीं बल्कि किसी सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए रहते हैं।  मनुष्य दूसरों से दो प्रकार से जुड़ता है।  मस्तिष्क से और हृदय से।  भारतीय संस्कृति में प्रायः हृदय के संबंध को अधिक महत्व दिया जाता रहा है।  जो 'वसुदैवकुटुंबकम' का आधार है।  किन्तु वर्तमान समय में, आधुनिकता के नाम पर मानव संबंध केवल मस्तिष्क से निभाए जाते हैं।  जो पाश्चात्य की ही देन है।  मनुष्य को भी एक संसाधन मानकर उनका प्रबंधन किया जाता है, जैसे अप्राण वस्तुओं के लिए किया जाता है।  अब मानव संबंध एक बंधन न होकर एक कला बन गई है।  जिसे निभाने के लिए हृदय और चिंतन की अपेक्षा केवल शाब्दिक प्रतिभा की और हेर-फेर और छल-कौशल की आवश्यकता होती है।  प्रेम की भावना होनी की आवश्यकता नहीं है, भाईचारा, एकता, सहायता, जानना, परिचय, जैसी भावनाएँ होने की आवश्यकता तो बिलकुल ही नहीं है।  बस एक नकली मुस्कुराहट ही काफी होती है।  कोई किसी के लिए न स्पंदित होता है और न ही किसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।  बल्कि किसी भी स्थिति के लिए स्पंदित होकर मदद करना या प्रतिक्रिया के रूप में हँसना असभ्य और पिछड़ा माना जाता है।  मनुष्य विकास और सभ्यता के नाम पर कुमार्ग पर चल पड़ा है।  जीविकोपार्जन के लिए, बनावटी शिष्टता के पाठ सीख रहा है।   मानवता की सहज प्रवृत्ति और मूल धर्म को भूल रहा है।  वह स्वयं को ही नहीं पहचान पा रहा है।  जो व्यक्ति स्वयं को नहीं जानता, वह दूसरों से संबंध कैसे जोड़ पाएगा?  वह स्वयं अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार रहा है।  जिस डाल पर बैठा है उसे ही काट रहा है। 
             मानव संवेदनाओं की आवश्यकता एवं उनका महत्व पर प्रकाश डालने का प्रयास कई रचनाकारों ने अपनी रचनाओं द्वारा की और अब भी प्रयत्न जारी है।  इसलिए कई रचनाएँ बहुत ही भावुक और रागात्मक बन पड़ते हैं।  पाठक या दर्शक उन्हें पढ़कर या देखकर वैसे ही स्पंदित होते हैं जैसे कोई रचनाकर उसका सृजन करते समय अनुभव करता है।  मुझे आज भी अच्छी तरह से स्मरण है कि जब मैं पहली बार कबूलीवाला कहानी पढ़ी थी, तो मुझे कैसा लगा था।  मेरी छोटी सी उम्र में ही आँखों में आँसू आ गए थे।  भावुक होने का अर्थ मूर्खता या नादानी नहीं किन्तु दूसरों की मनोदशा को समझना है।  किसी की हृदय से निकली हुई बात को अनुभव करना है।  कहानी का सारांश निम्न है -
            काबुल से आए हुए रहमान मेवे बेचता है।  उसकी दोस्ती 2 वर्ष की मीनू से हो जाती है।  रहमान उसके लिए रोज मेवे लाता है।  प्रतिदिन उन दोनों के बीच कुछ बंधी-बंधाई बातें और परिहास होता रहता है।  रहमान को देखते ही मीनू हँसती हुई उससे पूछती है  – "काबुलीवाला! ओ काबुलीवाला।  झोली में क्या है?"  रहमान बेमतलब नकियाते हुए जवाब देता – "हाथी"  यही उनके मज़ाक का अर्थ था और इस मज़ाक से दोनों को बड़ा मजा आता।  लेखक के रूप में मीनू के पिता का कहना है – "सर्दियों की सुबह-सुबह एक सयाने और एक कम उम्र की बच्ची की सरल हंसी मुझे भी बड़ी अच्छी लगती।  मैं सारा माजरा समझ गया।  जो अठन्नी मैंने काबुली वाले को दी थी उसी को उसने मिनी को वापस कर दी थी।"
एक बार रहमान से एक व्यक्ति उधार में एक रामपुरी चादर खरीदता है और कुछ समय बाद वह पैसे देने से मुकर जाता है।  इसी बात पर उस व्यक्ति से रहमान की बहस हो जाती है और गुस्से में आकार रहमान उसे छुरा भोंक देता है।  रहमान अब भी गंदी गालियां बक रहा था की इतने में "कबूलीवाला, ओ कबूलीवाला" पुकारती हुई मिनी घर से बाहर निकल जाती है।  मिनी को देखते ही क्षण-भर में रहमान का कृध से लाल चेहरा एक उदीप्त मुस्कान से खिल उठा।  उसके कंधे पर झोली नहीं थी, इसलिए झोली के बारे में दोनों मित्रों की पुरानी बहस न छिड़ सकी।  मिनी आते ही एकाएक उससे पूछ बैठी – "तुम ससुराल जाओगे?"  रहमान ने हँसकर कहा – वहीं तो जा रहा हूँ।" रहमान को जेल हो जाती है।  
जेल से छूटकर रहमान मीनू से मिलने उसका घर जाता है।  वह मीनू की कल्पना करता है कि वह अब भी बच्ची ही होगी जैसे वह छोड़कर गया था।  मीनू के पिता कहते हैं कि - "आज हमारे घर एक जरूरी कम है।  मैं उसी में लगा हुआ हूँ, आज तुम जाओ।" उनकी बात सुनते ही, वह उसी क्षण जाने को तैयार होता है, किन्तु फिर भी दरवाजे के पास पहुँच कर रुक जाता है और संकोच के साथ कहता है – "एक बार मैं बच्ची को देख नहीं सकता क्या?"... "आज घर पर बहुत काम है।  इसलिए आज किसी से मुलाक़ात न हो सकेगी।"  यह बात सुनकर वह उदास सा हो जाता है।  थोड़ी देर तक बेबस खामोश खड़ा उनकी ओर एकटक देखता रहता है, फिर 'सलाम बाबू' कहकर दरवाजे से बाहर निकल जाता है।  किन्तु मीनू के पिता के हृदय में एक टीस सी उठती है, वे उसे वापस बुलाना ही चाहते थे कि वे देखते हैं कि वह खुद ही चला आ रहा है।  कमरे में आकार रहमान कहता है – "ये अंगूर, किशमिश और बादाम बच्ची के लिए ले आया हूँ, उसको दे दीजिएगा।"  वह ढीले ढाले कुर्ते से एक कागज निकालता है और बड़े प्यार से उसकी तहें खोलकर दोनों हाथ से उसे मेजा पर फैला देता है।  उस कागज पर एक नन्हें-से हाथ के पंजे की छाप होती है।  फोटो नहीं चित्र नहीं, काबुल से आते समय सिर्फ़ हथैली में थोड़ी सी कालिख लगाकर उसी से उसकी बेटी के हाथों का निशान ले लिया होता है।  बेटी की इस नन्ही सी याद को छाती से लगाए रहमान हर साल कलकत्ता की गलियों में मेवा बेचने आता था, जैसे उस नाजुक नन्हें हाथ का स्पर्श उसके बिछौह से भरे चौड़े सीने में अमृत घोले रहता था।  यह देखकर लेखक की आँखें भर आती हैं और वे सोचते हैं  – जो वह है, वही मैं भी हूँ।  वह भी बाप है और मैं भी।  उसी समय मिनी को बुलाता भी है और उसके बाद उसे अपनी बेटी से मिलने जाने के लिए उसे पैसे भी देता है। 
            इस प्रकार रवीन्द्र ने मानव संबंध और उसकी मार्मिकता को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत कर पाए हैं।  निरस्वार्थ प्रेम मनुष्य में मनुष्यता की भावना जगाती है।  मनुष्य में संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है तो वह पशुतुल्य हो जाता है।    
भावनाओं का प्रस्तुतीकरण
            रचनाकार अपनी कृतियों में पत्रों के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं।  परम्पराओं के नाम पर समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और भय के कारण रस से भरा जीवन को स्वयं मूर्खता से नीरस बना लेते हैं।  रवीन्द्र एक आशावादी रचनाकार होने के कारण तत्कालीन सामाजिक समस्याओं का समाधान करने का भी भरपूर प्रयास किया है।  उनकी 'पड़ोसिन' कहानी विधवा विवाह के मुद्दे को लेकर चलती है।  उस कहानी के एक पात्र के द्वारा लेखक विधवा के बारे में कहलवाते हैं - 'उस चन्द्रलोक में अब भी तपिश है।  अब भी वहाँ गरम साँसों की हवा चल रही है।  वह किसी देवताओं के लिए नहीं, वरन मनुष्य के लिए ही है।  नवीन का लेखक मित्र बाल विधवा को देखकर निर्णय लेता है कि वह बंगाल में भी विधवा-विवाह प्रचलित करेगा।  जब उसका मित्र बहस करता है तो वह गुस्से में आकार स्पष्ट कहता है कि – "सुनो नवीन, कलाकार कहते हैं कि खण्डहर की अपनी एक खूबसूरती होती है, लेकिन किसी मकान को केवल चित्र के रूप में देखने से ही काम नहीं चलता क्योंकि उस मकान में रहना पड़ता है।  कलाकार कुछ भी कहता रहे, उस घर की मरम्मत जरूरी है।  वैधव्य के बारे में दूर बैठकर तुम चाहे जितनी कविताएँ  लिखना चाहो, किन्तु तुम्हें यह याद रखना चाहिए की उसमें आकांक्षाओं से भरा एक मानव हृदय अपनी अनोखी वेदना को लिए वास करता है"[4]
            इस प्रकार उनकी कहानियों में  सामाजिक चिंतन प्रस्फुटित होता है।  विधवाओं के प्रति उनकी सहानुभूति दृष्टिगोचर होता है।  वे अपनी अभिव्यक्ति कौशल से विधवा विवाह जैसा कठिन और वाद-विषय भी सरलता से प्रस्तुत करने की क्षमता रख पाए हैं।   रवीन्द्र का मानना है कि रचनाकर का हृदय अत्यंत कोमल और संवेदनशील होता है।  उनकी भावनाओं को वही समझ सकता है जो उन्हीं की तरह संवेदनशील और भावुक हो।  इसी तर्क को प्रमाणित करते हुए रवीन्द्र बाबू अपनी कहानी 'कवि का हृदय' में एक फूल से कवि की तुलना करते हैं। 
            'कवि का हृदय' कहानी में भगवान विष्णु कमल को देखकर मन-ही-मन विचार करते हैं कि 'मनुष्य' सृष्टि की सबसे सुंदर सृजन है और इसलिए वह एक सुंदर कमल के फूल को एक सुंदर युवती के रूप में परिवर्तित कर देता है।  तब वह युवती विष्णु से प्रश्न करती है कि अब वह किस स्थान में रहे?  विष्णु कमल से उत्पन्न हुई कोमल युवती को पृथ्वी, आकाश और जल में स्थान देना चाहते हैं किन्तु वह युवती कहीं भी नहीं रहना चाहती।  अंततः विष्णु युवती से कहता है – "जा कवि के हृदय में निवास कर" वह कवि वाल्मीकि के हृदय की गहराई को मापती है और उसका मुँह पीला पड़ गया और उस पर भय छा जाता है।  विष्णु पूछते हैं कि क्या उसे कवि के हृदय से भी डर है? वे फूल रूपी कन्या को समझाते हैं कि - "मनुष्य के रूप में परिवर्तित सुमन सुनो।  यदि कवि के हृदय में बर्फ है तो तुम वसंत ऋतु की उष्ण हवा का झोंका बन जाओगी, जो हिम को भी पिघला देगा।  यदि उसमें जल की गहराई है, तो तुम उस गहराई में मोती बन जाओगी।  यदि खाली वन है तो तुम उसके अंधेरे में सूर्य की किरण बनकर चमकोगी।"[5]
            इस प्रकार रवीन्द्र मानते हैं कि कवि का हृदय ब्रह्मांड से भी विशाल होता है किन्तु फूलों से भी कोमल।  रवीन्द्र की रचनाओं में भी मृदुता के साथ कठिन से कठिन तथ्य को प्रस्तुत करने की क्षमता होती है।  उनकी बहुमुखी प्रतिभा के कारण पाठक और अन्य रचनाकारों के लिए वे उत्प्रेरक बन पाए।  उनके उत्कृष्ट विचार और उन विचारों को स्पष्ट और सरल रूप से प्रस्तुत करने की कुशलता के कारण ही वे विश्व के साहित्य जगत में अपनी विशेष जगह बना पाए।  उनका पठन करने वाले पाठकगण निःसन्देह भाग्यशाली हैं।    





[1] रवीन्द्रनाथ टेगोर की यादगार कहानियाँ,(अपरिचिता), पृ.सं. 82
[2] वही,(कंचन) पृ.सं. 178
[3] रवीन्द्रनाथ टेगोर की यादगार कहानियाँ,(अपरिचिता), पृ.सं. 88
[4] रवीन्द्रनाथ टेगोर की यादगार कहानियाँ,(पड़ोसिन),पृ.सं. 89
[5] वही, (कवि का हृदय), पृ.सं. 261